जेल की चक्की पीस रहे कश्मीर के फेसबुकिया

इस राज्य से जुड़े कई अहम मामलों को हमारा कथित 'नेशनल मीडिया' जाने-अनजाने में अनदेखा कर देता है। दुर्भाग्यवश न्यायमूर्ति काटजू और माननीय सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में भी यह मामला शायद अब तक नहीं आया है। वरना कुछ न कुछ हलचल या दखल देखने-सुनने को अवश्य मिलता।
फोटो टैग करना पड़ा भारी
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के तीन नौजवान, जिनमें दो सरकारी शिक्षक भी थे, एक महीने से अधिक समय तक इस कानून के अंतर्गत जेल में सड़ रहे हैं। उनको जमानत मिलना तो दूर, सलीके से जांच किए बिना ही सम्बंधित जिलाधीश ने नौकरी से बर्खास्तगी के आदेश भी पारित कर दिये। इनमें से एक शख्स का दोष यह बताया जाता है कि उसने एक समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाले एक फोटो से खुद को टैग कर लिया अथवा किसी और ने उसे टैग कर दिया। फोटो किसी अज्ञात शख्स ने अपलोड किया था। प्रथम दृष्टया इस शख्स तो कुछ दोष समझ में आ सकता है, मगर इसके साथ दो लोग सलाखों पीछे कट्टरपंथियों के दबाव में ठूंस दिए गए।
कमेंट को लाइक करना पड़ा महंगा
चौकाने वाली बात ये है कि इनमे से एक ने इस फोटो पर यह टिपण्णी करने की गुस्ताखी की थी कि इस प्रकार की तस्वीरें पोस्ट नहीं की जानी चाहिये। ये महाशय बात को गलत कहने के बावजूद पुलिसिया कार्रवाई के शिकार बन गए। इसी प्रकार तीसरे युवक ने दूसरे युवक के 'समझदारीपूर्ण' कमेन्ट को लाइक करने की गुस्ताखी की थी।
मामले के जानकारों का कहना है कि जिस प्रकार मुंबई पुलिस शिव सैनिकों के कथित दबाव में दो युवतियों के खिलाफ आवश्यकता से अधिक क्रूर हो गयी, किश्तवाड़ की पुलिस व प्रशासन ने भी कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकते हुए इस बात का विचार तक नहीं किया कि इन युवकों का अपराध क्या और कितना संगीन है?
सम्बंधित जिलाधीश से ने तो आव देखा न ताव, तीनों पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट लगाने की सिफारिश कर डाली। जो लोग नियमित फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, वे इस बात से सहमत होंगे कि पुलिस प्रशासन इस तरह काम करने लगेगा तो भारत में हर रोज कई लाख लोगों को जेल जाना पड़ेगा। मुंबई प्रकरण के बाद यह बात कमोबेश देश को और उन पर निगरानी रखने वाली न्यायपालिका को तो समझ में आई है।
मगर पीड़ादायक बात यह है कि इस संवेदनशीलता और समझ का विस्तार जम्मू- कश्मीर तक होता नजर नहीं आ रहा। जिस कानून का मुंबई में दुरुपयोग दिल्ली में सत्ता और न्यायपालिका के गलियारों को गुंजा देता हो, उसका जम्मू कश्मीर में दुरुपयोग देश के कर्णधारों को क्यों नजर नहीं आता? जंतर-मंतर पर दूरसंचार प्रौद्यिगिकी के भयावह प्रावधानों को लेकर अनशन करने वाले केजरीवालवादियों को भी कश्मीर का यह मामला दिखाई नहीं दिया, ऐसा प्रतीत होता है।
एक देश में एक ही प्रकार की घटनाओं पर प्रबुद्ध वर्ग की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आना कई प्रकार के सवाल खड़े करता है। यहाँ किसी दोषी की पैरवी का सवाल नहीं है मगर यह सवाल अवश्य है कि सत्ता और शासन की आँखों पर सांप्रदायिक आधार पर या किसी अन्य कारण से कोई चश्मा चढ़ना कितना उचित है? चूंकि तीनों युवक राज्य के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए जम्मू कश्मीर में दिन-रात मानवाधिकार हनन का रोना रोने वाले कथित मानवाधिकार के ठेकेदारों ने भी इस मामले में कोई रुचि नहीं ली है। सवाल यह भी है कि क्या न्यायमूर्ति काटजू, सर्वोच्च न्यायालय और मानवाधिकारों के पैरोकार किश्तवाड़ के पुलिस अधीक्षक और जिलाधीश या फिर प्रदेश के मुखिया उम्र अब्दुल्ला इस प्रकरण में जवाबतलबी करेंगे
प्रशासन की एकतरफा और सांप्रदायिक सोच का प्रमाण यह भी है कि जहाँ एक तस्वीर में टैग हुए या किया गए, उस पर सकारात्मक कमेंट करने वाले और इस कमेन्ट को लाइक करने वाले तीन नागरिक तो कारागार में हैं, वहीँ इसकी प्रतिक्रिया में भारत विरोधी और आजादी के नारे लगाने वाले कट्टरपंथियों में से किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।












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