नरेंद्र मोदी को वीजा न देकर अमेरिका को क्या मिलेगा?
एक दशक के बाद जब यूनाइटेड किंग्डम ने ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर से प्रतिबंध हटाया तो अमेरिका ने भी इस पर अपनी इच्छा जाहिर की, ताकि इस राज्य से उसके रिश्ते मजबूत हो सकें। अमेरिका के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट रॉबर्ट ब्लेक ने कुछ महीने पहले कहा कि मोदी अमेरिका के वीजा के लिये आवेदन कर सकते हैं। 2005 में भाजपा के इस नेता को फ्लॉरिडा जाने से रोक दिया गया था। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता का हनन किया है। उन पर कुछ अन्य आरोप 2002 के दंगों को लेकर भी लगे थे।
कुछ दिन पहले अमेरिकी कांग्रेस के 25 सदस्यों ने मोदी को वीजा दिये जाने पर आपत्ति दर्ज की और अमेरिका की विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन को इस संबंध में पत्र लिखा। उसमें तर्क दिया कि उनकी सरकार दंगों के पीड़ितों के साथ न्याय नहीं कर रही है। इन सदस्यों में कईयां के अमेरिकी मुसलमानों के साथ काफी पुराने संबंध हैं। वहीं अन्य सदस्य काफी कट्टर रूढ़ीवादी, युद्ध का समर्थन करने वाले हैं, जिनकी वजह से इराक और अफगानिस्तान में युद्ध देखने को मिला।

मोदी के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के अंतर्गत लगाया गया। यह अधिनियम पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश लाये थे। वर्तमान सरकार ने अभी तक इस प्रतिबंध को हटाया नहीं है, जबकि कांग्रेस रिसर्च सर्विस या कांग्रेस थिंक टैंक गुजरात के विकास से खासे प्रभावित हैं। उसी गुजरात से जो नरेंद्र मोदी के दिशा-निर्देशों पर चल रहा है और इसी महीने मोदी तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की कगार पर हैं।
अमेरिकी कांग्रेसियों ने मोदी की अमेरिका में एंट्री का विरोध करते हुए कहा, चूंकि भारत के अगले आम चुनाव में मोदी को आगे चलकर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिये चुना जा सकता है, इसलिये अमेरिका में प्रवेश के लिये निवेदन आ सकता है। उन्होंने उन सभी बातों को सामने रखा, जिनमें मोदी को 2002 के दंगों का आरोपी माना जाता है।
तारीफ और आलोचना, यह दोहरा व्यवहार क्यों?
मोदी के लिये अमेरिका का दोहरा व्यवहार समझ में नहीं आता। एक तरफ वो गुजरात के मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकारों का हवाला देते हुए उन पर प्रतिबंध लगाये रखने की बात करते हैं। गुजरात दंगों के 10 साल पूरे होने पर एक कांग्रेसी कीथ एलिसन ने मार्च में प्रस्ताव 569 प्रेषित किया, जिसमें मोदी की भर्त्सना की, वहीं दूसरे कांग्रेसी जो वॉल्श ने मई में मोदी का समर्थन किया।
यहां तक उन्होंने राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा कि उन्हें मोदी से कुछ सीखना चाहिये। जिस तरह से उन्होंने फ्री एंटरप्राइज को बढ़ावा दिया उस तरह तो वाह अमेरिका के राष्ट्रपति बनने लायक हैं। देश में कुछ नेताओं की आदर्शवादी चिंता, जो यथार्थवादी नियमों पर चलती है, समझने से परे है।
मोदी एक चुने हुए शासक हैं, वो कोई तानाशाह नहीं। यह माना जाता है कि अमेरिकी नीतियों के तहत रॉबर्ट मुगाबे को मानवाधिकारों के हनन पर प्रतिबंधित किया गया, लेकिन मोदी और रॉबर्ट को एक तराजू में नहीं तौल सकते।
एक के लिये मोदी पिछले एक दशक से गुजरात पर शासन कर रहे सफल नेता हैं। वो उस देश के अब तक के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अहम माना जाता है। अमेरिकियों के लिये भारत बहुत-बहुत महत्वपूर्ण देश है। जब पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्ते अच्छे नहीं हों, तब तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
नरेंद्र मोदी में एक दुश्मन खोजने से अमेरिका का भला नहीं होने वाला, तब भी 25 कांग्रेस सदस्य उनका विरोध कर रहे हैं। तमाम आलोचनाओं के बाद भी मोदी ने गुजरात में अपने शासन के दस साल पूरे किये और 2002 के दंगे भी उन्हें एक अच्छा शासक बनने से रोक नहीं पाये।
विडंबना यह है कि इस व्यक्ति ने खुद को ऐसा बना दिया है कि उन्हें रोकना मुश्किल है, चाहे 2002 को लेकर कितनी ही आलोचना क्यों न हों। उनके राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों ने उन पर बार-बार निशाना साधा, लोगों को अहसास कराते रहे कि 10 साल पहले हुई घटना के जिम्मेदार वही थे। समस्या यह नहीं है कि दंगों में मोदी का कथित हाथ रहा, बल्कि समस्या तो मीडिया की एकतरफा भूमिका रही है।
समय आने पर अमेरिका को होगा अहसास
गुजरात की सामाजिक और आर्थिक उन्नति मोदी के कार्यों को बयां कर रही है। ऐसे में 10 साल पहले हुआ एक दंगा उनके अच्छे कार्यों पर पर्दा नहीं डाल सकते। यह बात पिछले दो चुनावों में सामने आ चुकी है। इस समय अमेरिकी मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार कर यह समझने के प्रयास कर रहे हैं कि इसमें क्या हो सकता है। सबसे अहम बात यह है कि अब तक न्यायपालिका ने मोदी को दोषी करार नहीं दिया है। जबकि उनके खिलाफ मांगें हमेशा उठती रहीं।
2002 नरसंहार के लिये 31 लोगों को दोषी ठहराया गया। इसके बाद भी अमेरिकी कांग्रेसियों ने इस बात को गंभीरतापूर्वक समझने के प्रयास नहीं किये और अब वो मोदी को वीजा देने की मुखालिफत कर रहे हैं।
टाइम मैगजीन ने इस साल मार्च में मोदी को कवर पेज पर प्रकाशित किया और कहा मोदी का मतलब व्यापार। एक आर्टिकल में लिखा गया कि मोदी भारत का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। अमेरिका की कार बनाने वाली कंपनी फोर्ड ने कई करोड़ डॉलर खर्च कर सानंद में इस साल नीव डाली। अगर एक व्यक्ति को उसके अच्छे कार्यों के लिये सराहा जाता है, तो बार-बार वीजा नहीं देने की बात क्यों उठती है। अमेरिकी सरकार उन कांग्रेस नेताओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती, जिन्होंने 1984 के सिख दंगों में अहम भूमिका निभायी थी। कहीं न कहीं यह पूरी तरह गलत है।
भारत की वर्तमान राजनीतिक कक्षा को देखें तो कौन सा नेता है जो व्यापार का मतलब समझता है। कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां मोदी अपने अनुशासन को लागू करने फेल हुए हों। अगर गुजरात के अलावा अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र, पंजाब या पश्चिम बंगाल में देखें तो वहां आपको एक से एक दबंग नेता मिलेंगे, जो आम नागरिकों से ठीक से बर्ताव करना तक नहीं जानते। जबकि गुजरात में देखें तो मोदी ने हमेशा अपने लोगों के लिये कार्य किये हैं।
अमेरिका को मोदी के शासन की तारीफ करनी चाहिये और मोदी को अमेरिका में दाखिल होने से रोकने के लिये प्रस्ताव पर फिर विचार करना चाहिये। खैर वैसे भी अमेरिका अगर वीजा नहीं भी देगा तो भी मोदी के व्यक्तित्व या काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। बार-बार मोदी को इस वीजा विवाद में खींचना भी गलत होगा। अमेरिका को खुद नहीं पता है कि आने वाले समय में उसे इसी व्यक्ति का सामना करना पड़ेगा। समय आने पर उन्हें खुद अहसास हो जायेगा।












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