पुण्‍यतिथि पर विशेष: इंदिरा को था मौत का आभास!

अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव

हर लम्‍हा हर शय में महसूस करोगे तुम
मैं अज्‍म की खुश्‍बू हूं.. महकूंगी जमानों तक

इंसान मरता है लेकिन शख्सियतें जिंदा रहती है। जिंदगी खत्म होती है लेकिन सोच कभी खत्‍म नहीं होती। वर्ष 1984 में आज का ही दिन (31 अक्टूबर 1984) इतिहास की ये वो काली तारीख है जिस दिन देश की ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी शहीद हो गईं। उस रोज आतंकियों की गोलियों से चिता की आग तक पहुंची इंदिरा गांधी का तन खाक हो गया मगर इतिहास के पन्‍नों पर इंदिरा जो लिख गईं वो सदियों की अमानत हो गईं। इंदिरा प्रियदशर्नी गांधी उर्फ इंदिरा गांधी के साथ ना जाने क्‍या था कि वो अक्‍सर अपनी मौत का जिक्र करती रहती थी। क्या किसी को मौत का एहसास उसे जीते जी हो सकता है? इंदिरा गांधी की पुण्‍यतिथि पर पेश है इंदिरा गांधी से जुड़े कुछ खास तथ्‍य-

 Nation pays tribute to Indira Gandhi on death anniversary

ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार के बाद इंदिरा गांधी को खुफिया विभागों ने यह जानकारी दी थी कि उनकी जान को खतरा है। उसके बाद से उनकी सुरक्षा में लगाये गये सभी सिक्‍ख सुरक्षा गार्डों को हटा दिया गया था। मगर इंदिरा गांधी ने कहा कि उनके लिये धर्म के लोग एक जैसे है और वो हर धर्म की इज्‍जत करती है इसलिये उन्‍हें किसी से खतरा नहीं है। इसके बाद सभी सुरक्षा गार्डों को वापस बुला लिया गया मगर उस दिन से ही इंदिरा गांधी के चेहरे पर एक बेचैनी दिखने लगी। वो अक्‍सर अपने घर में कुछ खास करीबियों से अपनी मौत की चर्चा कर करने लगी थीं। हत्‍या से ठीक एक दिन पहले यानी कि 30 अक्‍टूबर 1984 को भूवनेश्‍वर में इंदिरा गांधी ने अपने भाषण में कहा था कि 'मैं रहूं ना रहूं लेकिन मेरे लहू का एक-एक कतरा एक नये भारत को जन्‍म देगा'। उसके अगले ही दिन बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने इंदिरा गांधी को गोलियों से छलनी कर दिया। इंदिरा गांधी के प्राण पंक्षी बन उड़ गये मगर इंदिरा गांधी ने जो राजनीति की जो छाप छोड़ी वो आज भी अमर है। वो कहते हैं ना कि जिस्‍म के मर जाने से किरदार नहीं मरते।

मौत से पहले मरने की खबर थी जिनको
खून के कतरे की बात याद आयी थी जिनको
इबादत से इतिहास बनाना था जिनको
प्रियदर्शनी से इंदिरा बनना था जिनको

मांस को सब्‍जी समझ खा गईं थी इंदिरा

महात्‍मा गांधी से प्रभावित होकर शाकाहार अपनाने वाले जवाहरलाल नेहरू और उनकी पत्‍नी कमला नहरू अपनी बेटी इंदिरा गांधी को भी शाकाहारी बनना चाहते थे। मगर इंदिरा गांधी के साथ हुई एक घटना ने नहरू दंपत्ति की हसरत को पूरा नहीं होना दिया। इंदिरा गांधी ने अपने संस्‍मरण 'बचपन के दिन' में उस घटना का जिक्र करते हुए लिखा ''गांधीजी से प्रभावित होकर मेरे माता पिता ने मांस खाना छोड़ दिया था और यह निर्णय किया गया कि मुझे भी शाकाहारी बनायेंगे।

मैं चूंकि बड़ों के खाने से पहले खा लेती थी, इसलिए मुझे पता ही नहीं था कि उनका खाना मेरे से भिन्न होता था। एक दिन, मैं अपनी सहेली लीला के घर खेलने गई और उसने मुझे दोपहर के खाने पर रूकने को कहा। खाने में मांस परोसा गया। अगली बार जब मेरी दादी ने मुझसे पूछा कि मेरे लिए क्या मंगाया जाए तो मैंने उस स्वादिष्ट नयी सब्जी के बारे में बताया जो मैंने लीला के घर खाई थी। इंदिरा जी ने लिखा कि दादी ने सभी सब्जियों के नाम लिये लेकिन ऐसी कोई सब्जी हमारे घर में नहीं परोसी जाती थी। आखिर में लीला की मां को फोन करके यह पहेली सुलझाई गई। इसके साथ ही मेरे शाकाहारी भोजन का भी अंत हो गया''।

इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि देश ने दी श्रद्धांजलि

इंदिरा गांधी की 28वीं पुण्‍यतिथि पर पूरे देश ने आज इंदिरा गांधी को याद किया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी। मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और सिंह ने यहां आज सुबह गांधी के स्मारक शक्ति स्थल पर पुष्प अर्पित किए। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी, राहुल गांधी और दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना भी इस अवसर पर मौजूद थे।

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