विलासराव देशमुख: सरपंच से मुख्यमंत्री तक का सफर

8 साल तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे विलासराव देशमुख कांग्रेस के एक दिग्गज नेता थे। उनकी मौत निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिये एक करारा झटका है। देशमुख की मौत के बाद पूरे देश में शोक की लहर है। देशमुख की मौत की खबर आते ही राज्यसभा और लोकसभा को स्थगित कर दिया गया है। तो आईए कांग्रेस के इस दिग्गज नेता के राजनीतिक सफर पर चर्चा करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिये दुआ करें।
विलासराव का सरपंच से मुख्यमंत्री बनने तक का राजनीतिक सफर
भारत की आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 8 साल तक काबिज रहने वाले विलासराव देशमुख ने अपनी राजनीतिक करीअर एक सरपंच के तौर पर शुरु की थी। 1974 में विलासराव बाभलगांव के सरपंच बन और उसके बाद पंचायत समिती के सभापति। इसके बाद उन्हें जिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। उन दिनों विलासराव देशमुख कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे। युवा कांग्रेस के कई उपक्रमों में उन्होंने खुद को झोंक दिया था। 1980 में शिवराज पाटिल लोकसभा मे चुन के गये। उनकी जगह कांग्रेस ने विलासराव को विधानसभा के लिये उम्मीवारी दी। उसके बाद उन्होने अपने करीअर मे मुड के कभी नही देखा। विलासराव के पिता दगडोजीराव खुद सरपंच और एक कट्टर कांग्रेसी थे, तो स्वाभाविक है कि विलासराव भी कांग्रेसी ही बने। कांग्रेस के कद्दावर नेता विलासराव महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा नाम रखते थे। साथ ही वो महाराष्ट्र के राजनीति में कांग्रेस के सबसे अहम सिपहसलार थे। दरअसल इसकी वजह महाराष्ट्र के लगभग सभी बिजनेस घरानों से विलासराव देशमुख का मधुर संबंध रहा। देशमुख को औद्योगिक घरानों का समर्थन मिला हुआ था और कद्दावर नेता शरद पवार के कांग्रेस छोड़ने के बाद से कांग्रेस महाराष्ट्र के औद्योगिक संबंधों को लेकर विलासराव देशमुख पर ही बहुत हद तक निर्भर रही।
संगीत प्रेमी विलासराव को पसंद थे लता के गाने
1980 से 1995 तक लगातार तीन चुनावों में विधानसभा के लिए चुने गए और विभिन्न मंत्रालयों में बतौर मंत्री कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने गृह, ग्रामीण विकास, कृषि, मतस्य, पर्यटन, उद्योग, परिवहन, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, युवा मामले, खेल समेत अनेक पदों पर मंत्री के रूप में कार्य किया। विलासराव देशमुख का जन्मस्थल लातूर है और यही उनका चुनावी क्षेत्र भी है। राजनीति में आने के बाद से उन्होंने लातूर का नक्शा ही बदल दिया है।'मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री' 1995 में विलासराव देशमुख चुनाव हार गए लेकिन 1999 के चुनावों में उनकी विधानसभा में फिर से वापसी हुई और वो पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
लेकिन उन्हें बीच में ही मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी और सुशील कुमार शिंदे को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन अगले चुनावों में मिली अपार सफलता के बाद कांग्रेस ने उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया। पहली बार विलासराव देशमुख 18 अक्टूबर 1999 से 16 जनवरी 2003 तक मुख्यमंत्री रहे जबकि दूसरी बार उनके मुख्यमंत्रित्व का कार्यकाल 7 सितंबर 2004 से 5 दिसंबर 2008 तक रहा। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के दूसरे कार्यकाल के दौरान मुंबई सीरियल ब्लास्ट हुआ। हमले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय राजनीति का रुख किया और राज्यसभा के सदस्य बने। उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई और उन्होंने भारी उद्योग व सार्वजनिक उद्यम मंत्री, पंचायती राज मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री के पद पर काम किया। वर्तमान में विलासराव देशमुख विज्ञान और तकनीक मंत्री के साथ ही भू-विज्ञान मंत्री भी थे। इसके साथ ही विलासराव देशमुख मुंबई क्रिकेट एशोसिएशन के अध्यक्ष भी थे।
विलासराव देशमुख का जन्म, शिक्षा और परिवार
विलासराव देशमुख का जन्म 26 मई 1945 को महाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभालगांव के एक मराठा परिवार में हुआ था। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में स्नातक की पढ़ाई की। पुणे के ही इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। विलासराव ने युवावस्था में ही समाजसेवा करना शुरू कर दिया था। उन्होंने सूखा राहत कार्य में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। विलासराव देशमुख और उनकी पत्नी वैशाली देशमुख को तीन बेटे हैं। अमित देशमुख, रितेश देशमुख और धीरज देशमुख। अमित देशमुख लातूर से विधायक हैं जबकि रितेश देशमुख जानेमाने बॉलीवुड कलाकार हैं।
मिलनसार और कुशल वक्ता थे विलासराव देशमुख
विलासराव स्वभाव से बेहद उमदा व्यक्ती माने जाते थे। वे सब के साथ सहजता से घुलमिल जाते थे। करीअर मे वे जैसे जैसे आगे बढते गये, उन्होने खुद मे बदलाव लाए। बदलते वक्त के साथ वो भी बदल गए। विलासराव का व्यवहार सभी के प्रति अच्छा रहा। वे बडे ही खुशमिजाज स्वभाव के थे। अपने स्वभाव और कुशल नेतृत्त्व गुणो से वे सभी के चहेते बन गए। भरी सभाओ मे विलासराव अपने खास शैली से भाषण देते थे और पुरी सभा का दिल जीत लेते थे। उनकी सभाओ मे लोग दुर दुर से आते थे खास उन्हे सुनने के लिये। अपने दोस्त हो या राजनितिक प्रतिस्पर्धी, सभी लोग उनका आदर करते थे और उनके हुनर का लोहा मानते थे। अपने विरोधियो को उन्होने बडी सफलतासे मात दी. विलासराव मे आत्मविश्वास की कमी नही थी।
रितेश देशमुख के दुख में शामिल हुआ बॉलीवुड
2004 मे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान नागपुर मे उन्हे सवाल किया गया के अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? उस पर बडी ही सहजता से और आत्मविश्वास से उन्होने जवाब दिया, कौन होगा क्या? मै ही मुख्यमंत्री हू और मै ही मुख्यमंत्री बनुंगा। विलासराव की यह बद सच साबित हुई। वैसे तो विलासराव हर बात को सहजता से लेते थे। शायद यही सहजता उनके लिये भारी पड गई। 1995 मे जिस तरह से वे कॉंग्रेस के खिलाफ गये, या जिस तरह राम गोपाल वर्मा को लेकर वे मुंबई हमले के बाद ताज होटल मे गये, लेकिन हर कठीण समय पर वे डगमगाये नही और बडे ही धैर्य के साथ उन्होने हर परिस्थिती से मुकाबला किया। जिंदगी और मौत की जंग मे भी वे हंसते हंसते ही सबको अलविदा कह गये।












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