गिनी वर्म से दुनिया को मिली निजात

1986 में इसके 35 लाख रोगी थे। 2011में यह संख्या घटकर 1060 पहुंच गई । अब वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि गिनी वर्म के खिलाफ जंग हमने जीत ली है। गिनी वर्म पैर के जरिए शरीर में पहुंचता है। शरीर से उसकों निकालना बड़ा कठिन काम है। गिनी वर्म के खिलाफ जंग मे सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर की संस्था का था। गिनी वर्म का सबसे ज्यादा कहर दक्षिण सूडान, इथियोपिया, माली, और चाड में है। कार्टर सेंटर और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2015 तक गिनी कृमि रोग से छुटकारा पाने का टारगेट रखा था। लेकिन यह वक्त से तीन साल पहले ही टारगेट पा लिया।
वैश्विक उन्मूलन के प्रयास 1980 में शुरू किया। उस समय हर इस रोग 3.5 लाख मामले आते थे। हालांकि पिछले सालों तक 99 प्रतिशत तक मामले घट गए थे। गिनी कृमि रोग एक गंभीर और दर्दनाक परजीवी रोग है। पानी से इसका फैलाव होता रहा है। पानी के जरिए ये सारी दुनिया में फैल गए थे। इसका लार्वा पाचन ट्रैक प्रवेश और अगले 10 से 14 महीनों में बढ़ता है। इसकेकारण अक्सर रोगी अपाहिज तक हो जाते हैं।
ड्ब्लूएचओ ने कहा है कि स्माल पाक्स का हाल यह था कि 1967 में 1.5 करोड़ लोगों को यह रोग हुआ था। जिसमें 20 लाख लोगो की मौत हो गई । 30 लाख लोगो की आंख की रोशनी चली गई। हर साल यही होता रहता था। 30 देशों में यह जानलेवा रोग बन चुका था, इसमें भारत भी शामिल है। स्माल पाक्स का आखिरी मामला 1977 मे सोमालिया में मिला था। अब गिनी वर्म का भी अंत हो चुका है।












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