इस गर्मी फिर बिजली संकट झेलेगा उत्तर प्रदेश

राज्य में पिछले तीन सालों में बिजली का पीएलएफ सात प्रतिशत गिरकर 57.11 प्रतिशत रह गया है। वर्ष 2001-02 में राज्य में बिजली का उत्पादन 20463.649 मिलियन यूनिट था और पारीछा में 420 मेगावाट की इकाईचालू किये जाने के बावजूद वर्ष 2011.12 में खराब पीएलएफ के कारण उत्पादन महज 20406.928 मिलियन यूनिट रह गया था। ऑल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर बिजली क्षेत्र की इस बीमार दशा में हस्तक्षेप करने की मांग की है।
इस क्षेत्र का प्रबंधन कुशल विशेषज्ञों और अभियंताओं को सौंपने की मांग करते हुए फेडरेशन ने कहा कि बिजली के क्षेत्र में आईएएस अधिकारियों की तैनाती हालात सुधारने में नाकाम रही है।
फेडरेशन के नेता शैलेन्द्र दुबे ने जानकारी देते हुए बताया की उन्होंने इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री से कहा है कि बिजली क्षेत्र को पुनर्जीवित करने पर ध्यान दें क्योंकि इस पूरे मुद्दे से प्रदेश का विकास जुड़ा हुआ है। इसके अलावा इस मामले में एक विशेषज्ञ समिति भी गठित की जाए। उन्होंने कहा कि जो पीएलएफ वर्ष 2009-10 में 64.14 प्रतिशत था वह अगले वर्ष घटकर 60.28 प्रतिशत रह गया और 2011-12 में यह 57.11 प्रतिशत रह गया है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 70 प्रतिशत है। वर्ष 2009-10 में राज्य में बिजली उत्पादन 22912.371 मिलियन यूनिट था जो 2010-11 में घटकर 21556.735 तथा 2011-12 में 20406.928 मिलियन यूनिट रह गया।
कारपोरेशन की एनुअल रेवेन्यू रिक्वायरमेंट के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में उसे 13002 करोड़ रुपये का घाटा होने जा रहा है। श्री दुबे ने कहा कि पिछले कुछ सालों में बिजली की दरों में इजाफा नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि निजी कम्पनियों तथा केन्द्रीय क्षेत्र से खरीद के बाद उपभोक्ता को दी जाने वाली बिजली की एक यूनिट की लागत 5.77 रुपये आती है जबकि इसकी दर 3.70 रुपये प्रति यूनिट है।
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि बिजली चोरी को न रोक पाना भी कारपोरेशन के लिए आज एक बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि पारेषण हानियों के कारण रोजाना 27 मिलियन यूनिट बिजली की बर्बादी होती है जिससे कारपोरेशन को रोज आठ करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है।












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