क्या अब असरदार होगी रामदेव संग अन्ना की हुंकार?

अन्ना हजारे ने शुक्रवार को बाबा रामदेव के साथ एक संयुक्त प्रेसवार्ता बुलाई और सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया। साथ ही कहा कि वो 3 जून को राजधानी दिल्ली में सांकेतिक धरना देंगे। मीडिया ने एक बार फिर उन्हें सुर्खियों में सबसे ऊपर रखा है। इसमें कोई शक नहीं कि देश के कई अखबारों पर कल अन्ना फ्रंट पेज पर होंगे। आखिर क्यों न हो अन्ना हैं ही ऐसी चीज़! लेकिन सवाल यह उठता है कि जब देश के पांच राज्यों को अन्ना की हुंकार की जरूरत थी, तब वे क्यों आगे नहीं आये?
अन्ना जानते हैं कि पढ़ाना एक टीचर का फर्ज है, पर विश्वास से उन्होंने कभी नहीं पूछा कि तुम्हारे कॉलेज के लड़के कहते हैं कि तुम पढ़ाते नहीं फिर देश का दर्द तुम क्या समझोगे? यही नहीं उन्होंने कभी नहीं कहा कि केजरीवाल तुम सरकार का पैसा रोक कर गलत कर रहे थे, फिर तुम्हारे और टैक्स चुराने वालो में क्या फर्क है और तुम क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हो? तुम लखनऊ जाकर सिर्फ एसी कमरों में बैठते हो, तुम कैसे जन पाओगे कि एक किसान का दर्द क्या है ?
किरण बेदी से कभी नहीं कहा कि एक ही यात्रा के लिए दो-दो पैसा लेकर और उच्च श्रेणी का किराया लेकर निम्न श्रेणी में यात्रा करना भी धोखाधड़ी ही है तो तुम उस धोखेबाज से कैसे बेहतर हो, जो देश को चूना लगा रहा है? उन्होंने खुद से नहीं पूछा कि गाँधी कि तरह वह सेकेंड क्लास में सफ़र क्यों नही करते। उन्होंने हमेशा हवाई जहाज से सफ़र किया। अन्ना, गाँधी कि तरह साधारण क्लास में सफ़र करके हर स्टेशन पर क्यों नही देश कि जनता से मिले?
क्या अन्ना ने आम जनता के पत्रों का जवाब दिया?
उन्होंने कभी आम जनता के पत्रों का जवाब दिया? उन्होंने अपने आलवा कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ बैठने वाले अनशनकारियों को तरजीह दी? ऐसा लगता है, जैसे गलत तरीके से रमन मग्सेसे पुरस्कार पाये लोगों ने यह निशित किया कि भरष्टाचार की बात करके क्यों न अन्ना को भी यह पुरुस्कार दिला दिया जाये। इसके लिए सिर्फ देश की जनता को समय समय पर उकसाया जाता है।
उकसाना शब्द इस लिये लिख रहा हूँ क्योंकी उन्होंने अनशनकारियों को कभी गंभीरता से नही लिया और न ही गलत दवाओं और चोरी की चादर के प्रकरण में उन्होंने कभी बोलने की जरुरत समझी। यानि सिर्फ अपने को उठाने का एक प्रयास और अगर आपको ऐसा न लगे तो बताइए की जब देश के 5 राज्यों में चुनाव हो रहे थे, तो उन्होंने क्यों नही देश की जनता से कहा कि इस बार देश कि हर विधान सभा को इमानदारों से भर दो।
एक अपील तो कर ही सकते थे अन्ना?
अन्ना को देश ने इतना समर्थन और सम्मान दिया कि पूरा देश उन्हें यह भी करके दिखा देता पर उस समय यही दिखाने में पूरा समय बीता कि वह बीमार हैं, चल नही सकते। जिस मीडिया ने उन्हें इतना स्थान दिया वह बीमार अन्ना की अपील भी दिखा देता और बीमार अन्ना की अपील जादू सा असर करती और देश का भविष्य बदल जाता। अन्ना तब तक बीमार बने रहे जब तक चुनाव समाप्त नहीं हो गया और अब वह पूरी तरह ठीक हैं।
क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है? जब देश को बदलने का विकल्प शून्य (चुनाव और मत) की स्थिति में है, तो वह फिर देश को समझने की कोशिश कर रहे हैं कि देश के नेता चोर हैं, भ्रष्टाचारी हैं। क्या यह सिर्फ गलत समय पर देश के लोगों कि कोमल भवनाओं को उकसाने का प्रयास नहीं है? क्या भूमंडली करण के समय गांधीवाद को बाजारीकरण कि वस्तु बना कर गाँधी को बेचने का प्रयास नही है? अगर ऐसा नहीं है तो, उन्होंने सही समय पर सही बात क्यों नहीं उठाई? अन्ना जान गए हैं कि इस देश में भावना उकसा कर कैसे अपने को महान बनाया जा सकता है।
लेखक परिचय:- डा. आलोक चांटिया, श्री जयनारायण पीजी कॉलेज लखनऊ के प्रवक्ता एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के काउंसिलर हैं। साथ ही वो राष्ट्रीय अधिकार संगठन के अध्यक्ष भी हैं।












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