1550 रूपये के लिए कोर्ट ने मांगी 50 हजार की जमानत

आदमी ले केस वापिस लेन में ही समझदारी समझी। बताया जा रहा है कि रानियां गेट, मौहल्ला थेहड़ निवासी चंद्रशेखर मार्च में रेलवे स्टेशन गया था। वहां एक आदमी ने उसका पर्स चोरी कर लिया। चंद्रशेखर ने चोर को रंगे हाथों पकड़ लिया उसे रेलवे पुलिस के हवाले कर दिया गया। जीआरपी पुलिस ने पर्स चोरी करने के आरोपी अनिल कुमार के खिलाफ धारा 379 के तहत चोरी करने का केस दर्ज कर लिया। मामला कोर्ट पहुंचा, जहां 17 अप्रैल 2012 को चंद्रशेखर ने सीजेएम एनके सिंघल की कोर्ट में चोरीशुदा राशि वापिस लेने के लिए सुपरदारी की याचिका लगाई।
इस याचिका पर सुनवाई करने के लिए न्यायधीश ने चंद्रशेखर को चोरीशुदा 1550 रूपये लेने के लिए 50 हजार का जमानतदार पत्र जमा करवाने को कह दिया। इस फैसले से सभी हैरान हो गए। शिकायतकर्ता चंद्रशेखर ने कोर्ट से चंपत होने में ही समझदारी समझी। आखिरकार 1550 रूपये लेने के लिए 50 हजार रूपये की जमानत देना कहां की समझदारी है। कुछ ही देर बाद न्यायधीश को लगा की उनसे कोई चूक हो गई है इसलिए उन्होंने यह फैसला वापिस ले लिया। लेकिन इस खबर से एक बात जरूर विचार-विमर्श करने वाली बनती है कि क्या न्यायालय में बैठै न्यायधीश क्या वाकये में विवेकी व समझदारी भरे फैसले लेते हैं?












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