रजिस्ट्रेशन नहीं निकाहनामा जरूरी: मुस्लिम पर्सनल बोर्ड

सरकार ने जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम-1969 में संशोधन को मंजूरी दी है। इस संशोधन के तहत शादियों के पंजीकरण को भी इस कानून के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है। शादियों के पंजीकरण संबंधी संशोधन विधेयक को संसद के इसी बजट सत्र में पेश किए जाने की उम्मीद है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे मुस्लिम विरोध बताते हुए कहा है कि शादी के पंजीकरण की बजाए निकाहनामे की ही स्वीकार्यता होनी चाहिए।
दारूल उलूम देवबंद के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी ने कहा कि शादी के पंजीकरण को अनिवार्य करार दिए जाने से निकाहनामे का क्या मतलब रह जाएगा। इसका मुसलमानों पर सामाजिक तौर पर बुरा असर पड़ेगा, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वहीं सुन्नी-बरेलवी मुसलमानों की संस्था बरेली मरकज ने इससे अलग राय जाहिर करते हुए कहा कि मुसलमानों के यहां निकाहनामे का बड़ा महत्व है लेकिन अगर शादी के पंजीकरण संबंधी व्यवस्था से हमारा कोई सामाजिक और निजी नुकसान नहीं है तो इसका विरोध नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए। हमें नहीं लगता कि शादी का पंजीकरण करा लेने से निकाहनामे की अहमियत कम होगी।












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