जनता पर काम का बोझ और नेताओं पर छायी कामुकता

Laxman Sevadi, CC Patil
अजय मोहन

बेंगलुरु। जनता से वसूला जाने वाला तमाम तरह का टैक्‍स देश में सड़क, पुल, आदि बनाने के साथ-साथ लोकसभा व विधानसभा पर खर्च किया जाता है। मंत्री-विधायकों को मुफ्त में गाड़ी-बंगला दिया जाता है, ताकि वे देश को प्रगति के रास्‍ते पर ले जा सकें, लेकिन क्‍या आपको बर्दाश्‍त होगा, अगर कोई नेता सदन में बैठ कर सदन की कार्यवाही के दौरान अपने मोबाइल पर अश्‍लील वीडियो देखे।

कर्नाटक विधान परिषद के सदन में ऐसा ही कुछ हुआ है, जिस वजह से जनता उन नेताओं से खफा है। तीनों नेताओं में सबसे पहले नाम आता है सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सेवदी का जो हाथ में मोबाइल लेकर अश्‍लील वीडियो का मजा लूट रहे थे। उनके साथ थे महिला एवं बाल विकास मंत्री सीसी पाटिल और तीसरे हैं पर्यावरण मंत्री जे कृष्‍णा पालेमार जिन्‍होंने अपने मोबाइल से यह वीडियो सेवदी को भेजा था।

राज्‍यपाल ने इन तीनों का इस्‍तीफा मंजूर भी कर लिया है। यह खबर पूरे देश में इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है, लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसे मंत्रियों या विधायकों को क्‍या सजा मिलनी चाहिये। अगर हम सदन की कार्यवाही पर होने वाले खर्च की बात करें तो दोनों सदनों पर करीब 15 हजार रुपए प्रति मिनट का खर्च आता है। एक सत्र में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं। एक दिन सत्र चलने पर 50 से 60 लाख रुपए का खर्च आता है। यह वो पैसा है, जो सीधे जनता की जेब से जाता है। जरा सोचिये अगर इन नेताओं को जनता के धन की इतनी ही परवाह होती, तो ये सदन में क्‍या ऐसा काम करते। शायद नहीं। सच पूछिए तो जनता को भी अपने धन की कोई परवाह नहीं है, जो नेताओं पर खर्च होता है।

इस मामले पर अगर मुझसे कोई सवाल करे तो बतौर जर्नलिस्‍ट मैं एक ही बात कहूंगा। आज की डेट में सभी छोटी-बड़ी एमएनसी में काम करने वाले प्रत्‍येक कर्मचारी के ऊपर काम का प्रेशर होता है, क्‍योंकि उनकी कंपनी उन्‍हें टार्गेट देती है। टार्गेट ऐसा जिसे पूरा करना कभी-कभी असंभव लगता है। मेरा सवाल यह है कि अगर कॉर्पोरेट जगत में टार्गेट बेस पर काम हो सकता है, तो सदन में क्‍यों नहीं। एक नियम ऐसा बनाना चाहिये, जिसके अंतर्गत प्रत्‍येक मंत्री व विधायक व सांसद को भी काम कराने का टार्गेट देना चाहिये। उदाहरण के तौर पर अगर वो ढाई साल में इतना-इतना काम नहीं करा पाये, तो उन्‍हें सीधे कुर्सी से उतार देना चाहिये। यह पढ़ने के बाद लोग कहेंगे, कि ऐसा करने पर काम होगा नहीं और उलटा उपचुनावों का बोझ अलग से पड़ेगा।

जबकि सही मायने में देखें तो सत्‍ता के भूखे इन मंत्रियों पर जब तलवार लटकेगी, तो काम खुद-ब-खुद होने लगेंगे। निश्चित तौर पर ऐसा करने पर देश के विकास की गति भी बढ़ेगी।

इस मुद्दे पर आप भी अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्‍स में लिख सकते हैं।

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