महंगाई रोकने में बीता रिजर्व बैंक का पूरा साल

RBI's efforts to combat inflation in 2011
दिल्‍ली। रिजर्व बैंक का यह पूरा साल महंर्गाइ और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन साधने में ही निकल गया। मुद्रास्फीति पर अंकुश के लिये बैंक ने ब्याज दरें बर्ढ़ाइ जबकि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार बनाये रखने के लिये उसने एक ही झटके में कड़ा कदम उठाने के बजाय पूरे साल धीरे-धीरे सख्ती की। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए बैंक के लिये नया साल 2012 भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा।

बहरहाल साल समाप्त होते-होते महंर्गाइ के मामले में उसे सफलता मिलती दिखी जब खाद्य मुद्रास्फीति एक प्रतिशत से नीचे चली र्गइ। लगातार सख्ती से आर्थिक वृद्धि का पहिया धीमा पड़ने लगा था। वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि जहां 7.7 प्रतिशत रही वहीं दूसरी तिमाही में यह और धीमी पड़कर 6.9 प्रतिशत रह र्गइ।

कुल मिलाकर साल की पहली छमाही में आर्थिक वृद्धि 7.3 प्रतिशत आंकी गई जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 8.6 प्रतिशत पर थी। कैलेंडर वर्ष की बात करें तो जनवरी 2011 से लेकर 16 दिसंबर 2011 के बीच केन्द्रीय बैंक ने सात बार रेपो और रिवर्स रेपो दरों में 0.25 से लेकर 0.50 प्रतिशत के दायरे में वृद्धि की। इस दौरान रेपो दर 6.25 प्रतिशत और रिवर्स रेपो दर 5.25 प्रतिशत से बढकर दिसंबर में क्रमश 8.50 और 7.50 प्रतिशत पर पहुंच गई।

बैंक कर्ज और जमा पर इस वृद्धि का असर पड़ा और ब्याज दरें बढ र्गइ। ब्याज दरें बढ़ने से उद्योग जगत परेशानी महसूस करने लगा। कच्चा माल और निवेश महंगा हो गया। मांग पर भी इसका असर पड़ने लगा। यही वजह है कि अक्तूबर 2011 में औद्योगिक उत्पादन एक साल पहले की तुलना में 5.1 प्रतिशत घट गया।

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