यूपी वाले बतायें कितने सच हैं मायावती के दावे

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में विकास का डंका पीटने वाली मायावती हर दूसरी सभा में समाजवादी पार्टी पर जातिवाद की राजनीतिक के आरोप गढ़ने में पीछे नहीं रहती हैं। लेकिन खुद जातिवाद का तमगा लेकर देश भर में अपनी उपलब्धियों का डंका पीट रही हैं। अगर मायावती यह कहती हैं कि उन्होंने राज्य के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ी है, तो जाहिर है वो प्रचार के मामले में नीतीश कुमार की नकल कर रही हैं। लेकिन क्या इस तरह की नकल कर उन्हें यूपी में फिर से सत्ता हांसिल हो पायेगी?
इस सवाल का जवाब तो अंत में मिल ही जायेगा, लेकिन बात अगर नकल की चली है तो उस पर चर्चा भी जरूरी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पिछले कार्यकाल में बिहार का कायाकल्प कर दिया। कई पिछड़े इलाकों को शहरों की मुख्यधारा से जोड़ दिया, उन युवाओं को बिहार के अंदर रोजगार दिया, जो मुंबई-दिल्ली जाने के लिए अपना बैग पैक कर चुके थे। शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर सुविधाओं तक सभी में काया-कल्प कर दिया। बिहार चुनाव के पहले आलम यह था कि बिहार के हर व्यक्ति के मुंह पर उन्हीं का नाम था। जब सारे काम हो गये, तब उन्होंने अपने ही बिहार की जनता को अपनी उपलब्धियां गिनायीं।
यूपी का विकास कितना किया इसका जवाब महज 500 शब्दों के लेख में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसका जवाब खुद जनता ही देगी वो भी मतदान के दिन, लेकिन उपलब्धियां गिनाने के मामले में मायावती नीतीश कुमार से दो कदम आगे दिख रही हैं। 20 दिसंबर को मायावती ने देश के सभी राष्ट्रीय अंग्रेजी व हिन्दी दैनिक अखबारों में उन्होंने अपनी उपलब्धियों का विज्ञापन देकर डंका पीटा। देश भर में उपलब्धियां गिनाने का सिलसिला पिछले कई दिनों से जारी है। चाहे कांसीराम की पुण्यतिथि हो या अम्बेडकर से जुड़ा कोई दिवस, मायावती का विज्ञापन देश भर के अखबारों में आ जाता है।
आज के विज्ञापन में खास बात यह है कि यह उपलब्धियां सिर्फ मुसलमानों के लिए किये गये कार्यों की हैं। इस विज्ञापन में सबसे ऊपर लिखा है, "माननीय मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों में से खासतौर से मुस्लिम समाज के व्यापक हितों व उनकी तरक्की एवं खुशहाली हेतु किये गये बेमिसाल, महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्यों का संक्षिप्त विवरण। अर्थात मुस्लिम समाज की भलाई के लिए पिछले चार वर्षों में जितना ठोस, जमीनी व बुनियादी काम किया गया है, वह पूवर्ती सरकारें पिछले 40 वर्षों में भी नहीं कर सकीं।"
अगर ये दावे सही हैं, तब मो इस साल मायावती को आने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि राज्य की 20 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय की ही है। दूसरी बात यह कि इन दावों के साथ अगर प्रदेश भर के मदरसे वाकई में कंप्यूटरीकृत हो गये हैं, राज्य के हर मुस्लिम परिवार की बेटियों को 15,000 रुपए और साइकिल मिल गई है, हर गरीब मुसलमान परिवार को चिकित्सा देखभाल के लिए पांच हजार रुपए मिले हैं, 3000 उर्दू अनुवादकों की भर्ती पूरी हो गई है, अगर दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली हर गरीब मुसलमान छात्रा को 10 करोड़ की योजना का लाभ मिल रहा है और उर्दू पत्रकारिता के पत्राचार डिप्लोमा छात्रों तक 4,824 रुपए पहुंचे हैं तो मायावती से बेहतर मुख्यमंत्री हो ही नहीं सकतीं।
अगर राज्य के बुनकरों के हर परिवार को 15 हजार रुपए मिले हैं, बुनकरों को कंप्यूटर से बनी डिजाइनों का लाभ मिल रहा है, मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में बने 1,212 उच्च प्राथमिक विद्यालयों और 100 बालिका विद्यालयों में पढ़ाई की हर सुविधा मौजूद है, अगर इन विद्यालयों में टीचरों ने नियमित रूप से पढ़ाना शुरू कर दिया है और मिड डे मील की व्यवस्था दुरुस्त है व बच्चों को सरकार की ओर से किताबें और ड्रेस मिल रही है, और 295 करोड़ रुपए की योजना के अंतर्गत दशमोत्तर कक्षाओं के 36.25 लाख छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति मिल गई है तो मायावती इस बार भी सही विकल्प हैं।
अगर उत्तर प्रदेश में अगर और अगर बिजनौर, बुलंदशहर, बदायूं, बाराबंकी, बागपत, बहराइच, बलरामपुर, गाजियाबाद, ज्योतिबाफूलेनगर, खीरी, लखनऊ, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, पीलीभीत, रामपुर, शाहजहांपुर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर और सहारनपुर जैसे अल्पसंख्यक बहुल्य जनपदों में जहां 1,015 करोड़ रुपए लगे हैं, वहां 100 प्रतिशत विकास दिखाई दिया है, तो किसी भी वोटर को मायावती को वोट देने से पीछे नहीं हटना चाहिये।
लेकिन अगर ऊपर दी गई चंद योजनाओं में से किसी के क्रियान्वयन में कमी दिखाई दी है, या वो योजना लागू नहीं हुई है, तो बसपा को फिर से सत्ता में आने का कोई अधिकार नहीं। अपना निर्णय लेते वक्त जनता को दो शब्दों- 'चलता है' को भूलना होगा। यूपी की जनता को यह समझना होगा कि उन्हीं के करोड़ों रुपए खर्च कर राज्य सरकार अपनी इन्हीं उपलब्धियों का डंका देश भर में पीट रही हैं। यूपी के लोगों को देश की जनता को यह बताना होगा कि मायावती के ये दावे कितने सच हैं।












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