यूपी के इलाहाबाद शहर का राजनीतिक इतिहास

शिक्षा के क्षेत्र में इलाहाबाद यूपी के अच्छे शहरों में गिना जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को पूर्व का ऑक्सफोर्ड भी कहा जाता है। देश को सबसे ज्यादा IAS-PCS देने वाले इस शहर के विधि विश्वविद्यालय का भी जवाब नहीं, वहां एडिमिशन मिलना आज भी छात्रों के लिए टेढ़ी खीर है।
साथ ही यहां राजर्षी टंडन मुक्त विश्वविद्यालय है। इसके अलावा मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, ट्रिपल आईटी समेत कई इंजीनियरिंग कॉलेज भी है। लेकिन फिर भी यह धीमी गति का शहर कहा जाता है क्योंकि यहां विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ है। इसी कारण यह शहर खूबियां होने के बावजूद प्रदेश के अग्रणी शहरों में गिना नहीं जाता है। बिजली, पानी, सड़क जैसी बेसिक जरूरतों के लिए यह शहर हमेशा से लड़ता रहा है लेकिन उसे पूर्ण सफलता कभी नहीं मिली।
इलाहाबाद नार्थ, इलाहाबाद साउथ, इलाहाबाद वेस्ट, बारा, हंडिया, झूंसी, करछाना, कोरान, मेजा, नवाबगंज, फाफामऊ, फूलपुर, प्रतापपुर और सोरांओ यह सभी इलाहाबाद के प्रमुख निर्वाचन इलाके हैं। पूर्व में कांग्रेस का दबदबा होने के बावजूद यह शहर उसकी पकड़ से दूर होता गया है। रेवती रमण सिंह मौजूदा सासंद है जो सपा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
लेकिन कैश फार वोट मामले में सीबीआई द्वारा उनसे हुई पूछ-ताछ यूपी विधानसभा चुनाव में परेशानी का सबब बन सकता है। बीएसपी और सपा की चोर-सिपाही की लड़ाई के बीच इस शहर के लोग लंबे अरसे से पिसते आ रहे हैं। इसलिए यहां का क्राइम ग्राफ भी उच्च स्तर का है।
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने इस बार यूपी मिशन की शुरूआत फूलपुर से करके प्रदेश में पार्टी वापसी की पुरजोर कोशिश की है। उनके भाषण से कितने लोगों का दिल पिघलता है यह तो आने वाला वक्त बतायेगा लेकिन इतना तय है इलाहाबाद शहर इस बार के विधान सभा चुनाव में बसपा, सपा और कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण रोल अदा करेगा।












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