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रिटेल में एफडीआई का विरोध एक बहाना या माफियाओं का डर

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Walmart
दिल्ली (राजेश केशव)। किसी माफिया के खिलाफ कोई गवाही नहीं देता, कोई खुलकर विरोध नहीं करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोग उसे पसंद करते हों। उसका खौफ है कि कोई सच्चाई नहीं बोलता। यही हाल मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर है। विपक्षी दलों का हर नेता जानता है कि इससे महंगाई घटेगी। सही सामान मिलेगा। मिलावटी और नकली चीजों के धोखे से बच जाएंगे। किसान को सही कीमत मिलेगी। लेकिन हर विपक्षी नेता इसका विरोध करता हुआ नजर आ रहा है। इसकी वजह है छोटे दुकानदारों और किसानों का शोषण करने वाले व्यापारियों का वोट बैंक। और वो माफिया तंत्र, जो बिचौलिये का काम करता है।

हर कोई जानता है कि नकली और जानलेवा मिलावटी चीजें कौन बेचता है। कौन दो हजार की तनख्वाह में दुकान में 12 घंटे काम करवाता है। कौन है जो किसानों से दस रुपये में शब्जी खरीदकर शहर में रहनेवाली गरीब को चार गुनी रेट में बेचता है। खुशी की बात है कि यूपीए सरकार का रुख साफ है। वह पीछे हटते हुए नहीं दिख रही है।

यूपीए सरकार मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर उसी तरह व्यग्र हो गई है जैसे तीन साल पहले वह जुलाई 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु संधि को लेकर हुई थी। यह अच्छी बात है। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ कर दिया है कि सरकार इस फैसले से पीछे नहीं हटेगी, वहीं उनके करीबी और वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने तो यहां तक कह दिया कि अगर विदेशी सुपरमार्केट्स को भारत में आने से रोक दिया गया तो देश के करोड़ों निर्धनतम लोगों को चावल से लेकर सब्जियों तक के लिए ज्यादा कीमत चुकानी होगी।

यह सही भी है। अगर इस देश के आम नौकरी पेशा की जिंदगी में रौनक लानी है तो इन छोटे दुकानदारों पर लगाम कसनी ही होगी। कमाल की बात है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फिलहाल खुद ही दस लाख से ज्यादा आबादी वाले 53 शहरों में मल्टी-बांड रिटेल खोलने पर विदेशियों को

51 फीसदी निवेश की छूट देने की पेशकश की है। लेकिन कौशिक बसु ने लंदन से प्रकाशित टाइम्स अखबार को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा कि टेस्को व वॉल-मार्ट जैसी सुपरबाजार श्रृंखलाओं को भारत में स्टोर खोलने देना देश में खाद्य मुद्रास्फीति से निपटने के सबसे कारगर तरीकों में से एक है। आपको बता दें कि कौशिक बसु अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं और फिलहाल छुट्टी लेकर भारत में वित्त मंत्रालय के सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं। कौशिक ज्यादा उत्साहित दिख रहे हैं। लेकिन उनकी बातों में दम है।

उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक के बेनतीजा रहने के बाद कहा कि रिटेल सेक्टर में एफडीआई का फैसला जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि काफी सोच समझकर लिया गया है। उन्होंने राजधानी दिल्ली में आयोजित युवा कांग्रेस के सम्‍मेलन 'बुनियाद" में कहा कि इससे आम आदमी को रोजमर्रा की चीजें सस्‍ते दामों में मिलेंगी। जहां तक छोटे रिटेलरों व व्‍यापारियों का सवाल है तो कई बड़े देशों में छोटे और बड़े रिटेलर साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हमने इसीलिए कुछ शर्तें भी रखी हैं, जिसके अंतर्गत विदेशी कंपनियों के आने पर छोटे व्‍यापारियों को नुकसान नहीं होगा। फिर भी अगर कोई राज्‍य चाहे तो अपने यहां एफडीआई को लागू नहीं करे। इसके लिए वो पूरी तरह स्‍वतंत्र हैं। बता दें कि रिटेल व्यापार राज्यों का मामला है।

इसमें केंद्र सरकार नीतियां जरूर बना सकती है। लेकिन इसे अपनाना राज्यों की मर्जी पर है। कैबिनेट ने मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई को अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी है। इसके तहत दस लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में ही बहुराष्ट्रीय रिटेल कंपनियों को मेगामार्ट खोलने की अनुमति दी जाएगी। इसमें विदेशी कंपनी को कम से कम 500 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा। कंपनियों को निवेश का 50 फीसदी हिस्सा खुदरा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विकास और वेयरहाउसिंग आदि पर खर्च करना होगा। साथ ही कृषि उत्पादों को खरीदने का पहला हक सरकार को होगा।

सच्चाई तो यह है कि मल्टी-ब्रांड रिटेल में विदेशी पूंजी के आने से फूड प्रोसेसिंग, स्‍टोरेज और सप्‍लाई चेन में क्रांति आ जाएगी। इससे महंगाई

भी कम होगी। लोग कह रहे हैं कि इससे रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे। रिटेल सेक्टर में तीन करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। कभी आपने जा कर किसी दुकान में काम करनेवाले कर्मचारी से पूछा है उसकी तनख्वाह कितनी है। आम तौर पर छोटे शहरों में तीन हजार से ज्यादा तनख्वाह किसी कर्मचारी को नहीं मिलती। वहीं कम से कम वालमार्ट, केयरफोर, टेस्को मार्ट में 20 हजार से कम तनख्वाह नहीं मिलेगी।

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English summary
Cabinet approved allowing overseas companies to own as much as 51 percent of retail chains that sell more than one brand, paving the way for global retailers such as Wal-Mart Stores Inc. and Tesco Plc to own stores. This really get relief to common man of this country. किसी
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