रिलायंस इंडस्ट्रीज पर सरकार का सख्त रुख

Mukesh Ambani
दिल्ली (ब्यूरो)। रिलायंस इंडस्ट्रीज पर सरकार ने कथित तौर पर कड़ा रुख अपनाया है। कहा जा रहा है केजी बेसिन में गैस उत्पादन घटने से सरकार नाखुश है। इस खबर के बाद इस स्टाक में दो फीसदी नीचे चला गया। वैसे हकीकत यह है कि सरकार का एक बड़ा तबका रिलायंस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहता । यह इसी से समझा जा सकता है कि भाजपा सांसद वरुण गांधी ने हाल ही में कहा है कि सरकार, विपक्ष और अधिकारी कोई भी रिलायंस पर कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। यह वाकई दुखद है।

बहरहाल पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि केजी बेसिन के डी1 और डी3 ब्लॉक में क्षमता होने के बावजूद गैस काउत्पादन कम हो रहा है। सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज को केजी-डी6 के 2 ब्लॉक के लिए खर्च देना बंद करने का फैसला किया है। साथ ही, सरकार केजी-डी6 में निवेश किए गए 5.69 करोड़ रुपये को रिकवर करने के विचार में हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज का कहना है कि है प्राकृतिक वजहों की वजह से केजी-डी6 ब्लॉक में कम हो रहा है। ऐसे में सरकार निवेश की रकम वापस लेने पर कार्रवाई नहीं कर सकती है।

सितंबर में केजी बेसिन के डी1 और डी3 ब्लॉक में गैस उत्पादन 54 एमएमएससीएमडी से घटकर 35 एमएमएससीएमडी रहा था। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने साल 2012 के लिए केजी-डी6 ब्लॉक से 70 एमएमएससीएमडी गैस उत्पादन का लक्ष्य रखा है। गौरतलब है नियंत्रक व महालेखापरीक्षक (कैग) ने कृष्णा गोदावरी बेसिन में पूरा का पूरा डी-6 ब्लॉक रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास छोड़ने के लिए पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय की खिंचाई की थी और कहा था कि यह कंपनी के साथ उत्पादन में हिस्सेदारी के अनुबंध (पीएससी) के विरुद्ध है।

यह बातें कैग ने हाइड्रोकार्बन पीएससी पर संसद को सौंपी अपनी अंतिम रिपोर्ट में कही थी। लेकिन इसमें डी-6 ब्लॉक पर रिलायंस द्वारा 2004 के प्रस्तावित 2.4 अरब डॉलर के खर्च को 2006 में बढ़ाकर 8.8 अरब कर दिए जाने पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। कैग ने इस बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट में केजी बेसिन के डी-6 ब्लॉक के विकास पर होने वाले खर्च के बारे में कहा था कि अनुमानित खर्च को मंजूरी देने का अर्थ यह नहीं है कि परियोजना की वास्तविक लागत पर मुहर लगा दी गई थी। उसने कहा था कि पक्की मंजूरी वास्तविक लागत के ऑडिट के बाद ही दी जा सकती है।

रिपोर्ट में पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय और उसके तकनीकी प्रकोष्ठ हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) के इस इस निर्णय पर आपत्ति खड़ी की गई थी, जिसके तहत उसने रिलायंस इंडस्ट्रीज को बंगाल की खाड़ी स्थित डीडब्ल्यूएन 98.3 यानी केजी डी-6 ब्लॉक के पूरे 7645 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र को कंपनी के हवाले रहने दिया। रिलायंस ने 2001 में इस क्षेत्र में धीरुभाई एक और धीरुभाई 3 में गैस खोज ली थी। कैग की राय में उत्पादन में हिस्सेदारी के अनुबंध के तहत ज्ञात तेल गैस के स्रोत वाले क्षेत्रों को छोड़ रिलायंस को ब्लॉक का एक चौथाई हिस्सा लौटा छोड़ देना चाहिए था।

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