कश्मीर में विकास से ही अमन संभव: रिपोर्ट

हिंसा के दौर से बार-बार गुजरते रहे सूबे की समस्या का सियासी समाधान वार्ताकारों ने रिपोर्ट में सुझाया है। हर राजनीतिक प्रक्रिया में जनता की भागीदारी को भी इस मकसद से अहम बताया गया है। मानवाधिकार हनन की वजह से भी हिंसा का दामन थामने को विवश लोगों को सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) से राहत दिए जाने की सिफारिश भी वार्ताकारों ने की है।
सूत्रों की मानें तो वार्ताकारों ने कुछ इलाकों से एएफएसपीए को पूरी तरह हटाने और कुछ हिस्सों में इसमें नरमी लाने की सिफारिश की है। वार्ताकारों की टीम ने सूबे के नौजवानों के लिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार और मानवाधिकार हनन करने वाले को सजा दिलाने को जरूरी बताया है। वार्ताकारों के मुताबिक, राज्य के आम लोगों का केंद्र के प्रति अविश्वास समस्या का मूल कारण है। दिलीप पडगांवकर ने कहा कि अलगाववादी गुटों को छोड़ सभी तबकों ने वार्ताकारों की इस कोशिश में विश्वास जताया है। पडगांवकर के कहा कि अलगाववादियों ने यह मौका गंवा दिया है। अगर वे भी इस प्रक्रिया में शामिल होते तो कश्मीर की समस्या को समझने में ज्यादा मदद मिलती।
मुख्य वार्ताकार दिलीप पडगांवकर ने अपनी ओर से की गई पेशकश का कोई खुलासा तो नहीं किया तो लेकिन सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कश्मीर में जरूरी स्वायतत्ता देने की हिमायत की है। इसके लिए उन्होंने मिनिंगफुल आटोनामी शब्द का इस्तेमाल किया है। हालांकि इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट, संसद, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को छोड़कर बाकी मामले में राज्य को अपने कानून बनाने का अधिकार होगा।












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