किसके हाथ थी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कमान?

प्रधानमंत्री को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लिखी गई चिट्ठियों ने राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। पहले वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी की उस चिट्ठी ने कांग्रेस में बवाल खड़ा कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि पी चिदंबरम चाहते तो 2008 में वित्तमंत्री पद पर रहते हुए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को रोक सकते थे। अब एक और चिट्ठी का खुलासा हुआ है। पूर्व दूरसंचार मंत्री और डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने पीएमओ को चिट्ठी लिख यह मांग की थी कि 2जी स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने का अधिकार दूरसंचार मंत्रालय के पास ही रहने दिया जाए। जबकि इसका अधिकार मंत्री समूह के पास था। इतना ही नहीं दयानिधि मारन ने इसके लिए पीएम पर दबाव भी बनाया था।
गठबंधन का दबाव कहें या प्रधानमंत्री की इस घोटाले में भूमिका उन्होंने 2जी स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने का अधिकार दूरसंचार मंत्रालय को दे दिया। इस दौरान जीएमओ के अधिकारों की भी अनदेखी की गई। जिसके लिए सीधे तौर पर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री की इस छूट की वजह से ही तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा ने 2008 में स्पेक्ट्रम को 2001 में तय की गई कीमतों के आधार पर ही बेच दिया। इतना ही नहीं इसके लिए नीलामी भी नहीं की गई। पहले आओ और पहले पाओ के आधार पर ही स्पेक्ट्रम खैरात के भाव बांट दिए गए।
इस घोटाले के अब तक के मुख्य आरोपी ए राजा ने खुद को बेकुसूर करार देते हुए कहा था कि पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री को इस पूरे मामले की जानकारी थी। अब ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि जब प्रधानमंत्री ने ही खुद दूरसंचार मंत्रालय को स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने की आजादी दी थी तो उन्होंने इस मामले में क्यों दखल नहीं किया कि स्पेक्ट्रम की कीमत तय कराने में कोई भूमिका नहीं निभाई। अब देखना है कि ए राजा, कनिमोझी व दयानिधि मारन के बाद 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की गाज किस पर गिरती है। साफ छवि रखने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की इस काल कोठरी से बेदाग निकल पाएंगे या नहीं।












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