सरकार ने मजबूरी में नहीं बढ़ाये रसोई गैस के दाम

पेट्रोल, एलपीजी और डीजल के आसमान छूते दाम को देख खुद कांग्रेस अब परेशान हो गई है। पेट्रोल कीमतों को विनियंत्रित करने के अपने फैसले पर कांग्रेस सरकार अब खुदको कोस रही है, लेकिन जनता के सामने अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकती, लिहाजा पल्ला झाड़ना बेहतर समझ रही है। सही मायने में देखा जाये तो इस तरह महंगाई का तेजी से बढ़ना, पेट्रोल कीमतों का आसमान छूना और आरबीआई की ब्याज दरों का बढ़ना खुद कांग्रेस के लिए घातक है। सीधे तौर पर कांग्रेस खुद के लिए गड्ढा खोद रही है।
पेट्रोल के दाम बढ़ने के बाद जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी व वाम दलों ने देश भर में प्रदर्शन किये, उस पर यदि रसोई गैस के दाम बढ़ा दिये जाते, तो जनता की नाराज़गी कई गुना बढ़ जाती। यही सोच कर सरकार ने मजबूरन एलपीजी पर बैठक टाल दी। साथ ही कांग्रेस ने एक गैरजिम्मेदाराना व्यवहार भी दर्शाया है। प्रणब मुखर्जी से जब मीडिया ने सवाल किया तो उनका जवाब था, कि पेट्रोल की कीमतों से सरकार का कोई लेना देना नहीं। अब यह सब कंपनियों के हाथ में है।
इसका राजनीतिक पहलु देखें तो कांग्रेस अपनी चतुर राजनीति का खुद शिकार हो रही है। अन्ना हजारे के अनशन की वजह से पहले ही काफी किरकिरी झेल चुकी कांग्रेस पेट्रोल की कीमतें तभी बढ़ाती है, जब राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनीतिक उबाल आने वाल होता है, यदि उबाल प्रस्तावित नहीं होता है, तो कुछ न कुछ स्टंट कर कांग्रेस खुद उबाल ले आती है, ताकि भोली-भाली जनता पेट्रोल दाम में वृद्धि को भुला दे।
इससे पहले जब कांग्रेस ने पांच रुपए की वृद्धि की थी, तब उसके तुरंत बाद दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव को उलटा सीधा कह डाला, जिससे जनता का ध्यान उनकी तरफ चला गया। वहीं इस बार कांग्रेस ने मोदी के उपवास के ठीक पहले दाम बढ़ाये, ताकि जनता का ध्यान इस बार भी पेट्रोल कीमतों से हट जाये।












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