आतंकियों की शतरंजी चाल को समझने में नाकाम खुफिया तंत्र

Investigative body fails to avoid terrorist activities in Delhi
दिल्‍ली। दहशतगर्दों ने काफी सोच समझकर विस्‍फोट के लिये लगातार दूसरी बार दिल्‍ली हाईकोर्ट को निशाना बनाया। उन्‍हें अच्‍छी तरह से यह बात पता है कि कहां चोट पहुंचायी जाये तो दर्द ज्‍यादा से ज्‍यादा हो। इसलिये 25 मई 2011 को आतंकियों ने पहले प्रयोग किया और उसमें सफल होने के बाद बुधवार को हाईकोर्ट के गेट नंबर 5 पर कामयाबी का झंडा गाड दिया।

न्‍याय के चौखट पर मौत के मंजर को लेकर यह चर्चा है कि कई आतंकवादियों के मामले की सुनवाई चल रही। इसके साथ ही साथ मुंबई धमाके (26/11) के आरोपी अजमल कसाब और संसद हमले (13 दिसंबर 2001) के आरोपी अफजल गुरु जैसे शातिर और खतरनाक आतंकियों को फांसी होना शेष है। ऐसे में कोर्ट पर हमला न्‍यायिक व्‍यवस्‍था पर हमले के बराबर है। खैर जो कुछ भी हो मगर लागातार हमले ने सुरक्षा व्‍यवस्‍था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। दिल्‍ली पुलिस के पूर्व उच्‍चाधिकारियो की मानें तो ब्‍लास्‍ट के लिये दिल्‍ली हाई कोर्ट परिसर को दो बार चुना जाना यह साफ बताता है कि सुरक्षा एजेंसियां नाकाम साबित हो रही हैं।

पूर्व अधिकारियों का मानना है कि सुरक्षा एजेंसियां आतं‍कवादियों के अलार्म को समझ पाने में नाकाम रहीं। अगर 25 मई के विस्‍फोट को सुरक्षा एजेंसियों ने हल्‍के में नहीं लिया होता तो शायद भरोसे को छलनी करने वाले इस धमाके को रोका जा सकता था। रही दिल्ली हाईकोर्ट के पास विस्फोट की बात तो यह देश में एक प्रमुख भूमिका निभाने के तौर पर उभर रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट में कई महत्वपूर्ण मामले चल रहे हैं। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों को पता है कि कहां चोट पहुंचाई जाए जिससे सरकार को ज्यादा से ज्यादा तिलमिलाहट हो और लोगों में खौफ का वातावरण उत्पन्न हो। इसलिए 25 मई को कारगर विस्फोट करने में असफल रहने पर आतंकवादियों ने बुधवार का ही दिन चुना।

बुधवार को जनहित याचिका का दिन होने से अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा भीड़ देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश पुलिस से जुडे़ एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि जो बातें सामने आ रही हैं, उसके पीछे कोई बहुत बड़ा कारण है। हाईकोर्ट परिसर के सामने दो बार हमला करके आतंकवादी कुछ और ही संदेश दे रहे हैं। संभव है कि जिस तरह से अदालत के फैसले आ रहे हैं वह कई सफेदपोश लोगों को नागवार गुजर सकता है।

रही सुरक्षा की बात उसमें कोताही तो बरती ही गई है। यह कार्रवाई किसी एक दिन की नहीं मानी जा सकती। इसके पीछे पूरी योजना होगी। घटनास्थल की रेकी की गई होगी। पूरी तस्वीर उतारी गई होगी। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं इस मामले में खुफिया तंत्र नाकामयाब रहा। वैसे भी दिल्ली हाईकोर्ट एक ऐसा स्थान है जहां काफी सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिलती है। ऐसे में आतंकवादी घटना का होना कई सवाल खड़े करता है।

दिल्‍ली के दिल में अबतक के धमाके

25 मई 2011 : दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नंबर 7 के बाहर एक कार में, नुकसान नहीं।
19 सितंबर 2010 : राष्ट्रमंडल खेल से पहले जामा मस्जिद इलाके में फायरिंग, दो ताइबानी घायल।
27 सितंबर 2008 : महरौली में टिफिन में रखे बम विस्फोट, तीन की मौत।
13 सितंबर 2008 : छह सिलसिलेवार धमाके में 27 की मौत।
14 अप्रैल 2006 : जामा मसजिद में दो बम विस्फोट, 12 घायल।
29 अक्तूबर 2005 : पहाड़गंज, सरोजनी नगर एवं गोविंदपुरी में विस्फोट, 70 मरे।
13 दिसंबर 2001 : संसद भवन पर हमला, पांच आतंकवादी समेत 12 मरे।
22 दिसंबर 2000 : लालकिले में गोलीबारी, दो जवानों सहित 3 लोगों की मौत।
9 जनवरी 1998 : पुलिस मुख्यालय के सामने बम विस्फोट।
30 नवंबर 1997 : चांदनी चौक में मंदिर के निकट विस्फोट, तीन मरे, 73 घायल।
26 अक्तूबर 1997 : करोल बाग में दो विस्फोट, तीन मरे और 23 घायल।
10 अक्तूबर 1997 : शांतिवन, किंग्जवे कैंप और लाल किला के पास विस्फोट, एक की मौत।
12 जुलाई 1997 : बस अड्डे के नजदीक ब्लू लाइन में विस्फोट, तीन घायल।

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