सफेद लिबास की काली करतूत, अंधी-बहरी दिल्ली पुलिस

सुरक्षा एजेंसियों ने तो इस विस्फोट के बाद काबिले तारीफ काम किया। विस्फोट होने के 30 मिनट के अंदर ही देश की सबसे बड़ी सुरक्षा एजेंसी एनआईए ने इस धमाके के पीछे लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजहिद्दीन का हाथ होने की आशंका जता दी। सवाल यह है कि जब खुफिया एजेंसी 30 मिनट में धमाकों में शामिल होने वालों का नाम उजागर कर सकती है तो हमले से पहले कुछ क्यों नहीं पता लगा पाती? 13 जुलाई को मुंबई में हुए बम धमाकों को 2 महीने पूरे हो गए हैं खुफिया एजेंसियां उसके बारे में कोई सुराग क्यों नहीं लगा पाई।
दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर 3 महीने पहले 25 मई भी धमाका हुआ था। उसके बाद भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का लापरवाह रवैया जारी रहा। सरकार ने भी इस पर अपनी बयानबाजी करते हुए कहा दिया कि हमले के आरोपियों को पकड़कर उन्हें सजा दी जाएगी। ये बातें वही सरकार कर रही है जो पिछले महीनों में हुए बम धमाकों के बारे में कुछ भी सुराग नहीं लगा पाई है। जांच की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को सौंप दी गई है। जिसने अपने गठन के बाद अभी तक किसी भी बड़े हमले के बारे में कोई खुलासा नहीं किया है। लोग अक्सर कहते हैं कि अब दिल्ली दूर नहीं, शायद वहां लगातार हो रहे बम धमाकों के बाद इसे कुछ यूं कहा जाएगा कि अब दिल्ली सेफ नहीं। या यू कहें कि पूरा देश ही सेफ नहीं है।












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