84 रुपये गज तो कपड़ा तो नहीं ‌मिलता, सरकार ले रही है जमीन: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court
नई दिल्ली। 84 रुपये में तो गज भर कपड़ा नहीं मिलता, सरकार को तो इस भाव पर जमीन मिल रही है। इसके बावजूद सरकार किसानों को बेवजह अदालत के चक्कर कटवा रहे हैं। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने साढ़े चार दशक पहले उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में अधिग्रहीत की गई जमीन के मुआवजा मामले में केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए की। केंद्र ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने किसानों को 1200 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के मामले में 84 रुपये प्रति गज मुआवजा देने का आदेश जारी किया था।

जस्टिस जेएम पांचाल और जस्टिस एचएल गोखले की पीठ ने केंद्र और सीपीडब्लूडी से कहा कि गांव रईसपुर और हरसांव में अधिग्रहण के बाद मुआवजेको लेकर कई दशकों से मुकदमेबाजी चल रही है। आपने यह सोचा कि जिसकी जमीन गई, वह कैसे गुजारा कर रहा होगा। यह शोषण का अच्छा तरीका है कि जमीन छीनकर बेरोजगार कर दो फिर दशकों तक अदालतों के चक्कर कटवा दो। इससे बड़ा शोषण क्या हो सकता है।

पीठ ने कहा कि पहले राज्य सरकार और अब आपने इसमामले में याचिका दायर की। किसानों को इतना अरसा गुजरने के बाद भी मुआवजा नहीं मिला। इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश उचित है और अदालत उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। सर्वोच्च अदालत ने किसानों की ओर से पेश अधिवक्ता अभिषेक गर्ग की उस दलील को सही माना जिसमें कहा गया कि चार दशकों में जमीन का भाव कई गुना बढ़गया। इसके बावजूद सरकार हाईकोर्ट की ओर से तय मुआवजा देने को तैयार नहीं।

जबकि तय मुआवजा जमीन के बाजार भाव से कम है।मामले के मुताबिक सरकार ने इस जमीन पर मार्च, 1973 में कब्जा लिया, लेकिन मुआवजे की घोषणा 13 साल बाद सितंबर, 1986 में भूमि अधिग्रहण कलक्टर की ओर से की गई जिसमें तय मुआवजा मात्र 1.90 रुपये प्रति गज था। 1987 में भू-स्वामियों ने जिला जज की अदालत में मुआवजा बढ़ाने की मांग दायर कर दी।

जिला जज ने मार्च, 1991 में आठ रुपये प्रति गज और 30 प्रतिशत राहत राशि देने का आदेश दिया। असंतुष्ट किसानों ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

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