सहकारी बैंक के कारण रिश्तों में दरार

सहकारी बैंक के कारण रिश्तों में दरार
विनीत खरे

बीबीसी संवाददाता, मुंबई

आरबीआई ने सहकारी बैंक के निदेशक मंडल को भंग किया. महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच ख़राब होते रिश्तों का नया कारण है रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) का एक को-ऑपरेटिव बैंक के बोर्ड को भंग कर देना.

दरअसल महाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में एनसीपी का दबदबा था, इसके कई बोर्ड सदस्य पार्टी से जुड़े थे. लेकिन आरबीआई का बोर्ड के सभी सदस्यों को हटा लिए जाने का कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कारण था बैंक का आर्थिक रूप से ख़स्ताहाल होना और आरबीआई के नियमों का उल्लंघन.

हालांकि बैंक का आर्थिक रूप से ख़स्ताहाल होना दर्शाता है कि राज्य के को-ऑपरेटिव बैंकों के कामकाज में राजनीति का कितना दख़ल है. बैंक के लिए ये बुरी ख़बर उस वक़्त आ रही है जब ये अपने सौ साल पूरे कर रहा है. जानकारों की मानें, तो बैंक के बोर्ड में उन राजनीतिज्ञों को जगह मिलती थी जिन्हें किसी वजह से चुनाव का टिकट नहीं मिल पाया हो, वो चुनाव हार गए हों, या फिर उन्हें संतुष्ट करना हो.

हालांकि बैंक को स्थापित करने का मक़सद था किसानों को सस्ते ऋण देकर गाँवों में ख़ुशहाली के मौक़े पैदा करना. आरबीआई ने बैंक के कामकाज के लिए दो सरकारी अधिकारियों को नियुक्त किया है.

दरअसल नाबार्ड (नेशनल बैंक फ़ॉर एग्रिकल्चर ऐंड रुरल डेवलपमेंट) ने बैंक की ऑडिट में पाया कि बैंक की आर्थिक हालत ख़राब है. बैंक में वो ऋण बहुत ज़्यादा हैं जिनके वापस मिलने की संभावना न के बराबर है. सवाल उठ रहे हैं कि बैंक ने किन लोगों को ऋण दिए. नाबार्ड के कार्यकारी निदेश प्रकाश बक्शी ने अख़बार 'मिंट" को बताया कि बैंक ने चीनी की को-ऑपरेटिव फ़ैक्टरियों और कताई की मिलों को जो कर्ज़े दिए, उनकी वजह से ये घाटे हुए.

हालांकि बैंक के नए अधिकारी भरोसा दिला रहे हैं कि छोटे जमाकर्ताओं (जिनकी जमा पूँजी एक लाख तक है) को घाटा नहीं होगा क्योंकि बैंक में डिपॉज़िट इंश्योरेंस स्कीम लागू है. साथ है और भी दूसरी जमा-पूँजी है जिन्हें भुनाया जा सकता है.

बैंक के बोर्ड में 44 डायरेक्टर्स थे, जिनमें से अजीत पवार को मिलाकर ज़्यादातर एनसीपी और कांग्रेस के है. राज्य के उप-मुख्यमंत्री और शरद पवार के भतीजे अजीत पवार का सालों से इस बैंक पर नियंत्रण था. आरबीआई के इस क़दम से एनसीपी को शर्मिंदगी हुई है.

भाजपा के नागपुर से विधायक देवेंद्र फ़डनवीस ने मामले को विधानसभा में उठाया था. उनका कहना है, "नाबार्ड की रिपोर्ट आने से पहले ही पाँच प्रमुख एनसीपी नियंत्रित बैंकों ने 3,305 करोड रुपए बैंक से निकाल लिए थे. इसका मतलब था कि उन्हें गडबड़ी का पता था."

देवेंद्र कहते हैं कि महाराष्ट्र के सहकारी मंत्री हर्षवर्धन पाटिल ने विधानसभा में उनके सवाल के जवाब में ये आंकड़े दिए थे. उधर अजीत पवार ने आरबीआई के क़दम के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया और इसे राजनीति से प्रेरित बताया. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक़ बोर्ड के कुछ डायरेक्टर्स लगातार मीटिंग में शामिल नहीं होते हैं. उन्हें बोर्ड में इसलिए शामिल किया गया था ताकि उन्हें कामकाज की जानकारी हो, लेकिन ऐसा नहीं होता है.

रिपोर्ट में बैंक के दिए गए कुछ कर्ज़ों पर सवाल उठाए गए हैं और कहा गया है कि ये फ़ैसले बैंक के हित में नहीं थे. रिपोर्ट के मुताबिक बैंक के ऐसे कर्ज़े बहुत ज़्यादा हैं जिनके वापस आने की संभावना कम है. आरोप लग रहे हैं कि ऐसे कई कर्ज़ें संस्थाओं को राजनीतिक कारणों से दिए गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि पैसे वापस लेने के तरीक़ों को इस्तेमाल करने में बहुत देरी कही गई, बैंक में पेशेवर लोगों की कमी है और ऋण देने के तरीक़ों में कई ख़ामिया हैं.

ऑडिट रिपोर्ट कहती है कि बैंक ने ज़्यादातर चीनी फ़ैक्टरियों और कताई मिलों को दिए ऋणों को पुनर्निर्धारित किया जिसकी वजह से नॉन परफ़ार्मिंग ऐसेट्स यानी ऐसे ऋण जिनके वापस होने की संभावना बेहत कम है, उसमें इज़ाफ़ा हुआ. रिपोर्ट कहती है कि ऐसा करना रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया औऱ नाबार्ड के नियमों के विरुद्ध है.

बैंक की कहानी की शुरुआत 11 जुलाई 1911 में होती है जब इसे बांबे सेंट्रल को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेट के नाम से रजिस्टर किया गया. और बाद में इसका विलय विदर्भ कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से कर दिया गया. इसने महाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव बैंक के नाम से अपने काम की शुरुआत 1 मई 1961 से की.

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