सत्‍य साईं बाबा का चमत्‍कारी जीवन

Satya Sai Baba
पुट्टापर्थी। 23 नवंबर 1926 को पुट्टापर्थी में एक बच्‍चे ने जन्‍म लिया। नाम पड़ा सत्‍यनारायण राजू। उनकी जिंदगी किसी चमत्‍कार से कम नहीं थी। वो छोटी सी उम्र में ऐसे काम कर जाते थे, जो शायद बड़े-बड़े भी ना कर पायें। उन्‍होंने बिना गुरु के ही अक्षरज्ञान हांसिल कर लिया। खुद ही भजन लिखने लगे और खेल-खेल में स्‍कूली शिक्षा पूरी की।

1940 में उनके पैर में बिच्‍छू ने काटा। वे बेहोश हो गये। करीब चार घंटे बाद जब उनकी आंख खुली तो पूरा गांव उन्‍हें देख चकित रह गया। बाबा अचानक संस्‍कृत के श्‍लोक बोलने लगे। वे धारा प्रवाह संस्‍कृत बोल रहे थे, जबकि उन्‍होंने पहले कभी संस्‍कृत नहीं पढ़ी थी। अचानक ज्ञान का भंडार देख उनके माता-पिता घबरा गये और उन्‍हें लेकर डॉक्‍टरों व पुजारियों के पास गये। तभी एक दिन बाबा ने कहा कि मैं शिरडी के साईं बाबा का अवतार हूं, मुझसे डरो नहीं।

14 साल की उम्र में अचानक उन्‍होंने गांव छोड़ दिया और तपस्‍या करने निकल पड़े। सत्‍यनारायण राजू जब चार साल बाद लौटे तो वो सत्‍य साईं बाबा बन चुके थे। तभी बाबा ने लोगों से कहा, "मैं भगवान हूं, तुम भी भगवान हो। फर्क इतना है कि मुझे पता है और तुम्‍हें पता नहीं।"

देखते ही देखते बाबा के भक्‍तों की संख्‍या बढ़ती गई। पुट्टापर्थी में बाबा ने आश्रम स्‍थापित किया और वहां पहले राज्‍य के कोने-कोने से, फिर देश भर से और फिर दुनिया भर से भक्‍त उनसे जुड़ते गये।

आज 168 देशों में उनके अरबों भक्‍त हैं। ये भक्‍त सत्‍य साईं को भगवान की तरह पूजते हैं। उन्‍हें शिरडी के साईं बाबा के साथ पूजा जाता है। दुनिया भर के दिलों पर प्रभाव छोड़ने के बाद सत्‍य साईं ने 24 अप्रैल 2011 को 7:40 बजे उन्‍होंने दुनिया को त्‍याग दिया।

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