जनगणना 2011: दिल्लीवालों की पहली पसंद बेटियां नहीं बेटे
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली, विकासपुरुषों का धाम है। गांव-देहातों से निकलकर लोगग दिल्ली, नोएडा की शरण लेते है। लेकिन दिल्ली में टिकना आसान नहीं है। इसलिए यहां वही टिक पाते हैं जिनके पास प्रतिभा हो, विकास की इच्छा हो, लगातार लड़ते रहने का जुनून हो और अपनी पहचान बनाने की मंशा हो। साल 2011 की जनगणना में ऐसे बहुत से तथ्य सामने आए हैं जो विकास और आर्थिक रूप से मजबूत होने के दावों की असली तस्वीर सामने ला रहे हैं।
जनगणना 2011 ने दिल्लीवालों की बेटियों की चाह पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। यहां का लिंगानुपात देश भर में तय किए गए लिंगानुपात के मानक से काफी कम है। दिल्ली में हर 1000 लड़कों पर सिर्फ 866 लड़कियां ही हैं। ये तथ्य बताता है कि दिल्ली के विकास पुरुष अपने ही घर में हो रही बेटियों की हत्या को बचा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। देश में हर 1000 लड़कों पर 916 लड़कियों का लिंगानुपात है।
वैसे दिल्ली में जनगणना के आंकड़ों ने ये उघाड़ दिया है कि बेटियों को लेकर दिल्ली के विकास पुरुष, हरियाणा की खाप पंचायतों से भी जल्द बराबरी करने लगेंगे। क्योंकि हरियामा राज्य में यह लिंगानुपात 830 लड़कियों का है। जो दिल्लीवालों से बस कुछ ही कम है।













Click it and Unblock the Notifications