मुस्लिम लॉ बोर्ड की वेबसाइट से मॉडल निकाहनामा हटा
6 साल पहले 2005 में काफी सोच-विचार के बाद बोर्ड ने इसे अपनी वेबसाइट पर डाला था। यह सबके लिए सुलभ था। कोई भी इसे आसानी से देख सकता था। लेकिन यह कभी लोगों के बीच लोकप्रिय नहीं हुआ।
बोर्ड के प्रवक्ता कासिम रसूल इलियास के मुताबिक, "इसमें पति-पत्नी की जिम्मेदारियों का उल्लेख था और यह भी कहा गया था कि दोनों के बीच होने वाले विवादों का हल 'दारुल-काज़ा' (इस्लामिक अदालतें) में होगा, जो सभी शहरों में हैं। लेकिन गिने-चुने लोगों ने ही इसका इस्तेमाल किया।"
इस मॉडल निकाहनामे को बोर्ड की वेबसाइट से क्यों हटाया गया, इस बारे में बोर्ड के किसी भी पदाधिकारी ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। बोर्ड के कानूनी सलाहकार ज़फरयाब जिलानी के अनुसार, "मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि इसे जानबूझकर बोर्ड की वेबसाइट से नहीं हटाया गया है। बेवसाइट में सुधार के दौरान यह गलती से हट गया होगा। हालांकि मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि मॉडल निकाहनामा बहुत लोकप्रिय नहीं था, लेकिन इसके लिए केवल हम जिम्मेदार हैं। बोर्ड की बैठकों में कई बार यह सुझाव दिया गया था कि इसे लोकप्रिय बनाने का काम किसी व्यावसायिक एजेंसी को दे दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बोर्ड के लिए यह करना संभव नहीं था।"
वहीं, बोर्ड के कुछ सूत्रों का कहना है कि बरेलवी स्कूल ऑफ इस्लाम इसके पक्ष में नहीं था। उसने पहले भी मॉडल निकाहनामा का विरोध किया था और इसके खिलाफ गुपचुप अभियान चला रखा था। बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, "बरेलवी स्कूल हमेशा से तीन तलाक वाली व्यवस्था का समर्थक रहा है।"
मॉडल निकाहनामा मुस्लिम महिलाओं के बीच भी लोकप्रिय नहीं रहा। जिस साल यह निकाहनामा बोर्ड की वेबसाइट पर डाला गया था, उसी साल महिलाओं ने पुरुष श्रेष्ठता की परंपरागत मानसिकता को चुनौती देते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम वीमेन पर्सनल लॉ बोर्ड का गठन किया। बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने साफ कहा, "मॉडल निकाहनामा शरीयत प्रावधानों के अनुसार महिलाओं के हितों की रक्षा करने में विफल है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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