लोकपाल विधेयक के मसौदे को लेकर व्यापक असंतोष
नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। राजनीतिक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल नामक संस्था के गठन हेतु तैयार किए गए लोकपाल विधेयक 2010 के मसौदे को सामाजिक संगठनों ने निराशाजनक बताया है और कहा है कि यह एक अधिकार विहीन संस्था होगी, जिसके पास केवल सिफारिश करने के अधिकार होंगे और इसके दायरे में दोषी नौकरशाह नहीं होंगे।
विभिन्न मंत्रालयों की राय जानने के लिए वितरित किए गए मसौदा लोकपाल विधेयक 2010 में प्रधानमंत्री, मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने का प्रावधान है। लेकिन विधेयक कहता है कि शिकायतें सदन के पीठासीन अधिकारी के पास से होते हुए आगे जाएंगी। इस विधेयक में प्रधानमंत्री के मामले में लोकपाल के अधिकार क्षेत्र को लेकर खास सीमाएं प्रस्तावित हैं।
दरअसल, इस विधेयक को लाने के पीछे सरकार की खास मंशा है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन व राष्ट्रमंडल खेल परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोपों, मुम्बई हाउसिंग सोसायटी घोटाला, और विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने में हो रही देरी से शर्मसार सरकार इस विधेयक के जरिए जनता के गुस्से को शांत करने की कोशिश कर रही है।
इस विधेयक के मसौदे के आलोचकों का कहना है कि सौंपी गई शिकायतों की जांच करने के लिए लोकपाल स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं होगी और यह केवल सक्षम अधिकारी को अपनी सिफारिशें कर सकेगा।
लोकसभा के पूर्व सेकेट्ररी जनरल सुभाष सी.कश्यप ने कहा कि मसौदा विधेयक लोकपाल के विचार का दिखावा भर है और यह संस्थान अधिकार विहीन होगा।
कश्यप ने आईएएनएस से कहा, "लोकपाल के पास केवल अनुशंसा करने के अधिकार होंगे। केवल सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही इसके सदस्य होंगे। अन्य क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्ति इसके सदस्य नहीं बन पाएंगे। लोकपाल के पास जांच का भी अधिकार होना चाहिए।"
कश्यप ने कहा कि लोकपाल का मूल सिद्धांत स्कैंडिनेवियाई देशों में स्थित लोकपाल पर आधारित था, जहां प्रशासनिक देरी और सरकारी पद का दुरुपयोग भी इसके दायरे में आता है।
कश्यप ने कहा, "मैं नहीं समझता कि विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में इन पहलुओं को स्पर्श करता है। वरिष्ठ नौकरशाहों को भी इसके दायरे में नहीं रखा गया है।"
ज्ञात हो कि कुछ चर्चित व्यक्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने विकल्प के रूप में एक 'जन लोकपाल विधेयक' तैयार किया है। इस वैकल्पिक मसौदे का मकसद एक स्वायत्तशासी सर्वोच्च संस्था उपलब्ध कराना है, जिसके पास राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने का अधिकार होगा।
इस मसौदे को तैयार करने वालों में कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिंगदोह शामिल हैं।
ज्ञात हो कि इस जन लोकपाल विधेयक को कानून में परिवर्तित कराने के लिए सरकार पर दबाव बनाने हेतु रविवार को महात्मा गांधी के 63वें शहादत दिवस पर देश भर में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मार्च आयोजित किया था।
जन लोकपाल विधेयक का समर्थन कर रहे गैर सरकारी संगठन 'परिवर्तन' से जुड़ी अश्वथी मुरलीधरन ने कहा, "देश में मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधी प्रणाली में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) शामिल हैं। जहां सीबीआई प्रत्यक्षरूप से सरकार के अधीन है, वहीं सीवीसी एक सिफारिश करने वाली संस्था है।
विभागीय सतर्कता के मामले में किसी व्यक्ति को सतर्कता अधिकारी की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में एक स्वतंत्र संस्था की आवश्यकता है।"
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने आईएएनएस से कहा, "लोकपाल विधेयक आना चाहिए। विधेयक जब संसद में पेश हो जाएगा, तो पार्टी इसके प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया देगी।"
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता नीलोत्पल बसु ने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान हटाने के लिए लोकपाल विधेयक के बारे में बात कर रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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