थॉमस की नियुक्ति पर सर्वोच्च न्यायालय व भाजपा ने उठाए सवाल (राउंडअप इंट्रो)

नई दिल्ली, 27 जनवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के पद पर पी. जे. थॉमस की नियुक्ति का मामला गुरुवार को एक बार फिर गरमा गया। सर्वोच्च न्यायलय ने जहां थॉमस की नियुक्ति पर सवाल उठाए वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लपेटे में ले लिया।

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के पद पर पी.जे. थॉमस की नियुक्ति के लिए गठित की गई उच्च अधिकार प्राप्त समिति को थॉमस के खिलाफ लम्बित आरोप पत्र और ताड़ तेल आयात मामलों में मुकदमा चलाने के लिए केरल सरकार द्वारा दी गई मंजूरी की जानकारी नहीं थी।

भारतीय जनता पार्टी ने इसे सफेद झूठ करार देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाने की घोषणा की है तो कांग्रेस ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया है।

इस बीच, केंद्रीय विधि मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने देर शाम प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इस मुद्दे पर अदालत की टिप्पणी पर चर्चा की।

बाद में पत्रकारों से चर्चा में मोइली ने कहा कि सरकार भाजपा के आरोपों का अदालत में जवाब देगी।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एस.एच. कपाड़िया, न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने पूछा, "समिति के समक्ष इस तथ्य का खुलासा न करने की मंशा क्या थी? क्या यह सीवीसी की नियुक्ति को लेकर निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया को दूषित नहीं करती?"

न्यायालय ने पूछा, "आपराधिक मामले में थॉमस के खिलाफ आरोप पत्र लंबित होने अथवा केरल सरकार द्वारा उन पर अभियोग चालने की दी गई मंजूरी के सवाल में हम नहीं जाना चाहते। हमें बस इतना जानना है कि क्या इन सभी सूचनाओं को चयन समिति के समक्ष रखा गया था।"

महान्यायवादी जी.वाहनवती ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया, "थॉमस के खिलाफ लम्बित मामले की सच्चाई चयन समिति के समक्ष नहीं पेश की गई थी। चयन समिति के समक्ष जिस चीज को पेश किया जाना आवश्यक था, वह था पैनल में शामिल अधिकारी का बायोडाटा।"

इस पर न्यायालय ने पूछा, "पी.जे.थॉमस के बारे में प्रासंगिक तथ्यों की जानकारी चयन समिति को न देने का प्रभाव क्या पड़ा। क्या इससे पूरी चयन प्रकिया दूषित नहीं हुई।"

अदालत ने पूछा कि क्या सीवीसी के पद के लिए तीन ही योग्य उम्मीदवार थे या अन्य भी थे जिन्हें छांट दिया गया। नियुक्ति की पात्रता का शर्ते क्या थीं।

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या पैनल के दो अन्य अधिकारी भी पी.जे.थॉमस की तरह आरोपित थे, और फिर सीवीसी के रूप में चयन करने के लिए थॉमस को ही क्यों महत्व दिया गया।

याचिकाकर्ता 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटेरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल)' की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने न्यायालय से सीबीसी की नियुक्ति के सम्बंध में दिए गए अपने फैसले की समीक्षा करने का अनुरोध किया।

उधर, थॉमस की नियुक्ति पर सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा ने केंद्र सरकार पर सच छुपाने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि सच को सामने लाने के लिए वह सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करेगी।

भाजपा ने इसे 'सरासर झूठ' करार देते हुए कहा कि वह शीर्ष अदालत में सीधे तौर पर रिकार्ड रखने के लिए एक हलफनामा दाखिल करेगी।

भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने यहां कहा, "लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज सर्वोच्च न्यायालय में सीधे तौर पर रिकार्ड रखने के लिए एक हलफनामा दाखिल करेंगी। वह अदालत में सरकार द्वारा बताए गए झूठ को उजागर करेंगी।"

उन्होंने कहा कि स्वराज सीवीसी का चयन करने वाली तीन सदस्यीय समिति की सदस्य रही हैं। उन्होंने सरकार को इस बात से अवगत कराया था कि पाम ऑयल आयात मामले में थॉमस के खिलाफ आरोप पत्र लम्बित है।

प्रसाद ने कहा कि स्वराज स्पष्ट तौर पर कहा था कि सरकार चयन समिति द्वारा सुझाए गए दो अन्य नामों में से किसी का चयन कर सकती है और उन्होंने सुझाव भी दिया था कि जरूरत पड़े तो नियुक्ति की प्रक्रिया एक दिन के लिए टाली जा सकती है, लेकिन सरकार थॉमस की नियुक्ति पर अड़ी रही।

प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए प्रसाद ने कहा कि जिस तरह पूर्व दूरसंचार मंत्री की 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में और सुरेश कलमाडी की राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में संलिप्तता की जानकारी उन्हें थी, लेकिन उन्होंने बहाना बनाया, उसी तरह सीवीसी की नियुक्ति का रास्ता भी प्रधानमंत्री के द्वार से होकर गुजरा था।

उल्लेखनीय है कि सीवीसी की नियुक्ति के लिए पिछले वर्ष तीन सितम्बर को हुई चयन समिति की बैठक में स्वराज ने थॉमस के नाम पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। बैठक में प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने थॉमस के चयन की संस्तुति की थी और उस प्रस्ताव को बहुमत से पारित किया गया था।

जबकि कांग्रेस ने थॉमस की नियुक्ति मामले पर सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दिए बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर पार्टी कोई टिप्पणी करे।

कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने यहां कहा, "यह मामला अदालत और सरकार के बीच का है। यदि सर्वोच्च न्यायालय स्पष्टीकरण मांगती है तो सरकार के विधि अधिकारी इन चीजों को स्पष्ट करेंगे और जानकारी देंगे।"

यह पूछे जाने पर कि चयन समिति के सदस्यों में से एक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने सरकार द्वारा अदालत में दिए गए बयान को झूठ करार देते हुए हलफनामा दाखिल करने का जो निर्णय लिया है, इस पर उनका क्या कहना है, अहमद ने कहा कि कोई भी हलफनामा दाखिल कर सकता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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