फ़ेसबुक है लेकिन अख़बार नदारद

सुनील कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

गुडिय़ा सी ख़ूबसूरत और प्यारी हन्नाने पूरे कारवां की गोद में घूमती रहती थी और उसकी वजह से कारवां के लोगों के बीच आपस के कई तनाव भी हवा होते दिखे.

गज़ा से कुल एक देश, मिस्र, की दूरी पर ठहरे हुए हम सीरिया के दो शहरों में वक्त गुज़ारते रहे और फ़लस्तीनी शरणार्थियों की बस्तियों में जाते रहे.

भारत में जब मैं ये लिख रहा हूं टीवी पर एक रिपोर्ट चल रही है कि किस तरह दिल्ली में शरणार्थी कैंपों में एक-एक कमरों में कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे हैं जिन्हें अलगाववादी-चरमपंथी कश्मीरियों ने वहां से भगा दिया था.

यह मिसाल मैंने कारवां के कई लोगों के सामने रखी, लेकिन किसी के पास इस बात का आसान जवाब नहीं था कि भारत के भीतर ऐसा कारवां कश्मीर से बेदखल, बेघर हुए लोगों के लिए क्यों नहीं निकलना चाहिए.

फ़िलहाल गज़ा की चर्चा पर वापस लौटते हैं.

सीरिया में दमिश्क में डेरा कुछ लंबा रहा और वहीं के एक दूसरे शहर लताकिया में भी. जब बाकी लोग दमिश्क में थे तब कारवां के करीब 30 लोग दो दिनों के लिए लेबनान भी हो आए. लेकिन मेरी बारी उनमें नहीं लगी इसलिए वहां का बखान मुमकिन नहीं.

ईरान से रवाना होते हुए वहां के एक नौजवान साथी रूउल्ला की बीवी और बच्ची भी कारवां में आ गए. एक दूसरा पाकिस्तानी जोड़ा भी अपने तीन बेटों के साथ कारवां में पहुंच गया और यह फ़ैसला धरा रह गया कि कोई परिवार या बच्चे कारवां में नहीं रहेंगे क्योंकि ऐसा पिछला कारवां इसराइली हमले में 20 जानें खो चुका था.

अलग-अलग देशों से आए लोग अपनी-अपनी ज़ुबान में आज़ादी के गाने गा रहे थे.

रूउल्ला कश्मीरी हैं और चार बरस की उम्र में पिता के साथ ईरान आए और वहीं बस गए. उनकी पत्नी भी कश्मीरी हैं. इसलिए आठ महीने की नन्हीं हन्नाने के साथ उन्हें गज़ा तक जाने का मौका मिल गया.

गुडिय़ा सी ख़ूबसूरत और प्यारी हन्नाने पूरे कारवां की गोद में घूमती रहती थी और उसकी वजह से कारवां के लोगों के बीच आपस के कई तनाव भी हवा होते दिखे.

सीरिया में रहते हुए उन जहाज़ों का इंतज़ाम हुआ जो सहायता-सामग्री और यात्रियों को लेकर कर मिस्र के अल अरिश तक जाते. ऐसे दो बहुत महंगे किराए वाले जहाज़ों का इंतज़ाम मुस्लिम दुनिया ने यूं किया मानो वो किसी तीर्थयात्रा के लिए सड़क किनारे भंडारा लगा रहे हों.

सीरिया के दो शहरों में समय गुज़ारने के बाद जब मिस्र की इजाज़त मिली तो उसमें किसी ईरानी का नाम नहीं था.

कुछ लोगों की सोच थी कि इसका विरोध करने के लिए और ईरान के साथ एकजुटता दिखाने के लिए कुछ या सभी साथी वीज़ा मिलने के बाद भी जाना रद्द कर दें और मिस्र का विरोध करें. लेकिन गनीमत कि यह सोच टिक नहीं पाई।

मिस्र की सरकार पूरी तरह मेहरबान थी और वहां के गवर्नर समेत उनके आला अफ़सर जहाज़ लदने के वक्त वहां मौजूद थे.

कई एम्बुलेंस, सोलर बिजली जनरेटर, दवाएं, चिकित्सा उपकरण और करोड़ों का सामान जहाज़ पर लदा तो घंटों तक कारवां के लोगों को बिना पिए नशा सा रहा और कई देशों के गाने सब मिलकर गाते रहे.

दो दिन बाद इसी जहाज़ पर आठ चुनिंदा लोग सवार हुए क्योंकि मिस्र ने उतने ही लोगों को जाने की इजाज़त दी थी.

बाकी करीब सवा सौ लोग एक विशेष विमान पर दमिश्क जाकर सवार हुए और मिस्र पहुंचे. पानी के जहाज़ पर सवार होकर जाने वालों को शहादत के लिए रवाना होने जैसी विदाई दी गई क्योंकि हमले का खतरा तो था ही.

इस खतरे के बाद भी कारवां का हर कोई इन आठ लोगों में शामिल होने की कोशिश में लगे रहे. मैं भी अपने कैमरों के साथ जाना चाहता था लेकिन नंबर लगा नहीं.

फ़लस्तीनी शरणार्थी बस्तियों में यासिर अराफ़ात से ज़्यादा चे की तस्वीरें नज़र आ रही थीं.

इतने तमाम मुस्लिम या इस्लामी देशों से गुजरते हुए जो सबसे अजीब बात मुझे लगी, वह थी अखबारों की ग़ैरमौजूदगी.

ईरान के फुटपाथों पर तो बहुत अखबार थे लेकिन बाकी तमाम जगहों पर लगभग नदारद. लोग पढ़ते हुए तो दिखते ही नहीं थे. और तो और होटलों की लॉबी तक में अखबार नहीं थे.

मैं पता नहीं क्यों इस पूर्वाग्रह को नहीं छोड़ पाता कि अख़बारों की मज़बूत मौजूदगी सीधे-सीधे लोकतंत्र की मज़बूती से जुड़ी बात है. हालांकि इसके खिलाफ भी मिसालें हैं और पाकिस्तान में तो अख़बार निकलते ही हैं.

लेकिन इस पूरी मध्यपूर्व की दुनिया में इंटरनेट तक लोगों की पहुंच खूब दिखी और कई देशों में रोक दी गई 'फेसबुक’ जैसी वेबसाईटों तक पहुंचने का तोड़ हर किसी के पास था.

इन तमाम देशों में हमारे नए बने दोस्त ऐसी वेबसाईटों का रास्ता जबरन खोलकर ही रात-दिन हमारे साथ रहते हैं.

एक दूसरी बात यह है कि इन देशों में जहां-जहां भी औरत हिजाब, चादर या बुर्के में कैद है, वहां भी वह घर में कैद नहीं है. वह, कम से कम, शहरों में तो कामकाजी है और देश और दुनिया से बात करना जानती हैं.

ईरान की महिला फ़िल्म निर्देशिकाओं का काम दुनिया भर में जाना और माना जाता है और ऐसी होनहार महिला से मेरी मुलाकात फिल्म समारोहों में होती ही रहती थी. औरतों से ग़ैरबराबरी बहुत है लेकिन पढ़ाई जैसे दायरों में लड़कियां लड़कों के बराबर या आगे हैं.

सफ़र की बात करें तो हर जगह एक देश से दूसरे की सरहद पार करते वक्त अपना पूरा सामान ढोकर लंबी दूरी तय करनी होती थी.

मेरे साथ तो सात-आठ किलो का कैमरा बैग और उससे कुछ ही हल्के लैपटॉप बैग थे ही, 15 किलो से अधिक भारी बैक पैक भी था. लेकिन बहुत नाजुक छोटी युवतियां या बहुत बुज़ुर्ग भी अपना पूरा बोझ ढोते चल रहे थे.

ऐसे ही कारवां मिस्र और फ़लस्तीन के गज़ा शहर के बीच की रफा चौकी पर पहुंचा जहां दूसरी तरफ फ़लस्तीनी मेज़बान अपनी बसें लिए खड़े थे.

(बाकी अगली किस्त में)

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