पार्टियां हुईं सक्रिय पर मतदाता मौन

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
मुस्लिम समुदाय को रिझाने के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में होड़ सी चल रही है.
राज्य विधान का कार्यकाल अभी 16 महीने बाक़ी हैं, मगर सभी राजनीतिक दलों ने अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.
नया साल शुरू होते ही उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों ने जोर पकड़ लिया है. पार्टी दफ्तरों में भीड़ बढ़ने लगी है.
तैयारियों के लिहाज से सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी सबसे आगे है.
बसपा ने आधी से अधिक यानी लगभग 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. इनमें से ज्यादातर वे सीटें हैं, जहां पिछली बार बीएसपी हारी थी.
लेकिन बसपा ने कई जगह मौजूदा विधायकों को भी लाल झंडी दिखा दी है. जैसे औरैया से कैबिनेट मंत्री अशोक दोहरे का टिकट काटकर उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया.
उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में मुख्यमंत्री मायावती के जन्म दिन पर पूरे प्रदेश में कार्यक्रम करके तमाम सरकारी योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया. मायावती को उम्मीद है कि इन योजनाओं से फायदा पाने वाले लोग उनकी पार्टी से भी जुडेंगे.
अपने जन्मदिन समारोह में उन्होंने कहा, ''मै यह भी उम्मीद करती हूँ कि हमारी सरकार ने जन्मदिन पर जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के तहत जो भी महत्वपूर्ण फैसले किये हैं, उसका फायदा खासकर समाज के जो गरीब, शोषित और उपेक्षित वर्गों को जरुर मिलेगा और उनका जीवन थोडा और बेहतर होगा.''
पिछले चार सालों से मायावती अपने बंगलों, मूर्तियों और दलित नेताओं के स्मारकों में ही दिखाई देती रही हैं. अब चुनाव करीब आने पर मायावती ने कहा है कि वह फरवरी से, यानि अगले कुछ दिनों में, जिलों का दौरा करके विकास कार्यों का औचक निरीक्षण करेंगी.
मायावती की सबसे बड़ी चिंता और चुनौती यह है कि पिछले चुनाव में मुलायम सिंह को हराने के लिए अगड़ी जातियों और मध्यम वर्ग के जो मतदाता बीएसपी के साथ जुड़े थे, सरकार के कामकाज से उनका मोहभंग हो गया है.
बीएसपी कार्यकर्ताओं को भी शिकायत है कि माया सरकार में नौकरशाही हावी है और किसी की सुनवाई नहीं है. रिश्वतखोरी और वसूली की शिकायत आम है.
उम्मीदवारों के चयन में में बसपा ने जो फुर्ती दिखायी है, उसका असर दूसरी पार्टियों पर भी पड़ा है. मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी ने संभावित उम्मीदवारों के इंटरव्यू पूरे कर लिए हैं. सपा के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का कहना है कि फरवरी के दूसरे हफ्ते में गोरखपुर में पार्टी के राज्य सम्मलेन के बाद उम्मीदवारों की पहली सूची घोषित हो सकती है.
श्री चौधरी कहते हैं, ''समाजवादी पार्टी तो विधान सभा चुनाव के लिए लगातार कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों को तैयार कर रही है. पिछले छः महीने से प्रत्याशियों के चयन में भी लगे हैं और उत्तर प्रदेश में जो जन विरोधी सरकार है, लोकतंत्र विरोधी सरकार है , उसके खिलाफ हमारा संघर्ष भी चल रहा है.''
सपा और बसपा में सत्ता का एक ही केन्द्र होने से उम्मीदवारों की सूची आसानी से फाइनल हो जाती है , लेकिन भारतीय जनता पार्टी में निर्णय प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल है.
भाजपा पेशेवर एजेंसियों के माध्यम से भी संभावित उम्मीदवारों का सर्वे करवा रही है. इसलिए बीजेपी को प्रत्याशी सूची फाइनल करने में समय लगेगा.
भाजपा नेता फिलहाल 31 जनवरी तक गाँव चलो अभियान में लगे हैं. इसके बाद 5 फरवरी को कानपुर में एक बड़ी रैली प्रस्तावित है, जिसे चुनाव अभियान का श्रीगणेश भी कहा जा सकता है.
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं कि बी जे पी हमेशा चुनाव के लिए तैयार है.
दीक्षित कहते हैं, ''लगातार संघर्ष करते हुए, लगातार जन संवाद बढाते हुए, जन संपर्क और आंदोलन करते हुए हम राज्य में बीएसपी की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं. सपा कांग्रेस से आम आदमी पहले से ही निराश है. जनता ने तीनों पार्टियों की सरकार देख ली है. इस बार बी जे पी सरकार बनाने लायक बहुमत प्राप्त करेगी , इसका हमें विश्वास है.''
लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को काफी पीछे धकेल दिया था. इसलिए भाजपा नेता पहले तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बढते जनाधार से चिन्तित रहते थे. लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों के उभरने के बाद अब बी जे पी नेताओं को लगता है कि शायद उत्तर प्रदेश में अगडी जातियां और शहरी मध्यम वर्ग वापस उसके साथ आ सकता है.
कांग्रेस को इस बात का एहसास हो गया है कि उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव आसान नहीं होगा. इसीलिए कांग्रेस अब माया सरकार के खिलाफ जमीन पर संघर्ष की तैयारी कर रही है.
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, ''उत्तर प्रदेश में जो बदहाली हो गयी है, बीस सालों में.किसानों को बिजली मिलती नही. जो क्षेत्रीय पार्टियां हैं , वे कवल लूट में लगी हैं.विकास कार्य होते नही. भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है. उत्तर प्रदेश की जनता परिवर्तन चाहती है. जात पांत और धर्म से उठकर विकास और तरक्की के लिए युवकों को आगे लाने के लिए कांग्रेस पार्टी यह चुनाव लड़ेगी.''
कांग्रेस पार्टी की भी कोशिश है कि चुनाव से एक साल पहले यानि मई तक उम्मीदवारों की सूची तय हो जाए. केंद्रीय मंत्रिमंडल के हाल के फेरबदल में भी कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव को ध्यान रखते हुए पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समुदाय को महत्त्व दिया.
मुस्लिम समुदाय को रिझाने के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में होड सी चल रही है. मुलायम मुसलमानों से जुड़े किसी मामले पर कांग्रेस पर हमला करने से नही चूक रहे हैं.
राजनीतिक दल भले ही अभी से अपनी-अपनी बिसात बिछाने में लगे हों , लेकिन मतदाता बिलकुल मौन है.


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