लीक दस्तावेजों से फ़लस्तीनी संगठन नाराज़

लीक दस्तावेजों से फ़लस्तीनी संगठन नाराज़

पूर्वी यरुशलम में ही यहूदियों और मुस्लिमों के प्रमुख तीर्थस्थल हैं

फ़लस्तीन के प्रमुख गुटों ने उन लीक हुए दस्तावेज़ों पर कड़ी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है जिसमें ये दिखाया गया है कि फ़लस्तीनी वार्ताकार इसराइल के साथ बातचीत के दौरान बड़ी ज़मीन देने के लिए तैयार थे.

गज़ा पट्टी पर नियंत्रण करने वाले इस्लामी संगठन हमास का कहना है कि ये दस्तावेज़ दिखाता है कि फ़लस्तीनी प्राधिकरण इसराइली कब्ज़े के समक्ष समर्पण करने को तैयार था. हालांकि फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास का कहना है कि फ़लस्तीनी पक्ष को ग़लत तरीके से दर्शाया जा रहा है.

ये दस्तावेज़ अरबी न्यूज़ चैनल अल जज़ीरा ने दिखाए है.

अगर लीक हुए दस्तावेज़ों को सही मान लिया जाए तो ज़ाहिर होता है कि फ़लस्तीनी नेता सार्वजनिक रूप से तो कड़ा रुख़ दिखा रहे थे लेकिन बातचीत की मेज़ पर वो लेन-देन के लिए भी तैयार थे.

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच पिछले वर्ष शुरू हुई बातचीत फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियों के विस्तार के मुद्दे पर ठप हो गई थी.

इसराइल ने पूर्वी यरूशलम और पश्चिमी तट में यहूदी बस्तियों का विस्तार रोकने से इंकार कर दिया था.

फ़लस्तीनियों का रुख़ था कि इसराइल अधिकृत फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियों का निर्माण रोके तभी बातचीत जारी रह सकती है.

लेकिन इन लीक हुए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि फ़लस्तीनी नेतृत्व 2008 में ही कुछ बड़े फ़लस्तीनी इलाक़ों पर अपना दावा छोड़ने के लिए तैयार हो गया था. इन दस्तावेज़ों में कहा गया है कि हालाँकि फ़लस्तीनी नेतृत्व अपने सिद्धांतों पर ही समझौता करने के लिए तैयार हो गया था, तब भी इसराइल ने उनके प्रस्तावों को नामंज़ूर कर दिया था.

ब्रिटेन में फ़लस्तीनी राजदूत मनुअल हसासियान ने बीबीसी से बातचीत में इन दस्तावेज़ों की प्रमाणिकता पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा है कि ये सिर्फ़ एक पक्ष की बात करते हैं.

हसासियान का कहना था, ''अगर ऐसा हुआ भी है तो ये बहुत बड़ी रियायतें हैं. लेकिन मेरा ख़याल है कि हमें इन रियायतों को उपयुक्त संदर्भ में देखना चाहिए. इन रियायतों के बदले में इसराइल क्या देने को तैयार हो रहा था. कोई इस पहलू की बात नहीं कर रहा है.''

उनका कहना था, “मेरा नहीं ख़याल कि फ़लस्तीनी नेतृत्व बदले में कुछ भी मिले बिना, इसराइल को ये रियायतें सिर्फ़ तोहफ़े के तौर पर देने को तैयार हो सकता है. इसलिए दूसरे पक्ष यानी इसराइल की रियायतों को भी देखा जाना चाहिए.”

इन दस्तावेज़ों के लीक होने से जो नुक़सान हुआ है, उसे कम करने के लिए फ़तह संगठन और फ़लस्तीनी प्रशासन के नेता अथक प्रयास कर रहे हैं.

मुख्य फ़लस्तीनी वार्ताकार साएब एराकात ने इन दस्तावेज़ों को झूठ का पुलिंदा क़रार दिया है. फ़तह की वेबसाइट पर पार्टी सदस्यों का आहवान किया गया है कि वो रामल्लाह में अल जज़ीरा टेलीविज़न चैनल के दफ़्तर के सामने विरोध प्रदर्शन करें.

बहुत से फ़लस्तीनियों ने इन दस्तावेज़ों से ज़ाहिर होने वाले उस लेन - देन के रुख़ पर बहुत निराशा जताई है जिसके लिए फ़लस्तीनी नेता तैयार हो गए थे.

इनमें सबसे प्रमुख ये मुद्दा है कि फ़लस्तीनी नेता इसराइल को पूर्वी यरूशलम में कुछ इलाक़ा छोड़ने के लिए कथित तौर पर तैयार हो गए थे. जबकि पूर्वी येरूशलम पर इसराइल ने 1967 के युद्ध में क़ब्ज़ा किया था और अंतरराष्ट्रीय क़ानून में पूर्वी येरूशलम पर इसराइल का क़ब्ज़ा अवैध है और वहाँ कोई निर्माण गतिविधि नहीं होनी चाहिए.

बहुत से लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं कि ये दस्तावेज़ किसने और क्यों लीक किए हैं. और क्या इन दस्तावेज़ों को लीक करने का मक़सद फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की साख़ ख़राब करना था. हो सकता है कि फ़तह में चल रहे सत्ता संघर्ष की वजह से भी किसी ने ऐसा कर दिया हो.

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