राजघाट से गजा-4

राजघाट से गजा-4

सुनील कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

सीरिया में जगह जगह ऐसे पोस्टर दिख जाते हैं.

फ़लस्तीन के लिए मानवीय सहायता और दोस्ताना हमदर्दी लेकर निकले इस कारवां के पांच हफ्ते के लंबे सफर पर कई गैरराजनीतिक बातें भी छाई रहीं.

‘‘हम क्या चाहते – आजादी’’ का दमदार नारा बसों में उस वक्त ‘‘हम क्या चाहते- डब्ल्यूसी ’’ में तब्दील हो जाता था जब बस कई घंटे थमने का नाम नहीं लेती थी. डब्ल्यूसी यानी वेस्टर्न कमोड.

मूत्रालय के लिए इस पूरी मुस्लिम दुनिया में इस काम के लिए बनी जगह की ही प्रथा है और हिन्दुस्तान की तरह नहीं कि मर्द किसी भी जगह खड़े हो जाएं.

फिर बसों में महिलाएं भी तो थीं.

नतीजा यह था कि ड्राइवर या स्थानीय आयोजक जब घंटों बस न ठहराते, तो ये नारे लगने लगते. मजे की बात है कि जिसे ये तमाम देश वेस्टर्न कमोड कहते हैं, वह है हिन्दुस्तान का देशी अंदाज का शौचालय.

लेकिन पश्चिम से परहेज के चलते भी उसे वेस्टर्न कहा जाता है.

आम तौर पर इसके लिए बड़े बस अड्डों या मस्जिदों में बसें थमतीं क्योंकि हर बड़े बस अड्डे पर नमाज पढऩे और हर मस्ज़िद में नमाज के पहले फारिग हो जाने की पूरी सहूलियत रहती थी.

साफ़ सफाई

मैंने अपने फोन के स्क्रीन पर शौचालय की तस्वीर लगा ली थी ताकि उसे दिखाकर ड्राइवर को समझाया जा सके.

लेकिन नमाज के पहले गजब की सफाई, वहां के लोगों के खाने-पीने में नहीं दिखती थी.

न खाने के पहले हाथ धोने का कहीं रिवाज, और न ही एक-दूसरे के जूठे का ख्याल.

बिना धुले हाथों से या जूते उतारने के तुरंत बाद लोग खाने लगते, बड़ी-बड़ी रोटियां मेज पर सीधे पड़ी रहतीं और तमाम लोग गंदे हाथों से ही उसे तोड़ते रहते. नमाज के पहले जैसी साफ-सफाई, खाने के पहले भी होती तो ऊपरवाले के दिए गए बदन और सेहत की भी बेहतर देखभाल हो जाती.

लेकिन तमाम खानों के वक्त जो गजब की बात देखने मिली, वह थी सामाजिक बराबरी की. हमारी बसों के तमाम ड्राइवर, कंडक्टर, क्लीनर हमारे ही साथ की टेबिलों या दरी पर साथ-साथ खाते थे.

किसी जानकार ने बताया कि अल्लाह ने सबको बराबरी का कहा है और इस मुस्लिम दुनिया में उस पर पूरा अमल होता है. इन आधा दर्जन देशों में मैंने छोटे से छोटे काम वाले लोगों को बड़े अफसरों और मंत्रियों तक से पूरी बराबरी से बात करते देखा, बिना डरे-सहमे या झिझके.

बराबरी

सभी बस कर्मचारी हमारी ही होटलों में रूकते, हमसे सीधे नाम लेकर बात करते और बस में अपना खाना भी हमें खिलाते रहते.

वह शायद तुर्की ही था जहां एक बस कंडक्टर मेरे साथी फोटोग्राफर स्वप्निल के बगल में बैठे उसके गले में हाथ डाले गाने पर नाच सा रहा था.

जिस मुस्लिम दुनिया को कई लोग पिछड़ा मानते हैं, उसमें छोटे समझे जाने वाले काम की इज्जत भी देखने लायक थी.

हिंदुस्तान की बिरादरी तो गैरबराबरी पर फख्र करते हुए ज़िंदा है. तुर्की के जिस रेस्तरां में हम एक शाम गुजारने पहुंचे थे वहां का वेटर अपना गिलास भरकर खुद आ गया और हम लोगों के साथ बैठकर गिलास टकरा रहा था, हमारे कैमरों पर तस्वीरें देख रहा था.

जगह-जगह बाजारों में, दुकानों और सड़कों पर लोग हमें स्कार्फ, मफलर या चेहरे-मोहरे से पहचान लेते थे क्योंकि इन तमाम देशों में गज़ा जा रहे लोगों को तीर्थयात्रियों सी इज्जत मिल रही थी.

कई जगह लोग चाय-कॉफी के पैसे लेने से मना कर देते थे या सामानों के दाम घटा देते थे.

मेरी तरह के कोई आधा दर्जन से अधिक लोग शाकाहारी थे जिनको खाने की कमी भी रही और कई बार हमारे फेर में पूरे के पूरे कारवां को शाकाहारी ही खाना पडा.

ऐसे में लोग मेरे सरीखे कट्टर शाकाहारियों को कोसते भी रहे. इन तमाम देशों में लोग इतने भयानक पैमाने पर सिगरेट और हुक्का पीते हैं कि बस.

शायद इसलिए कि शराब और दूसरे नशों पर कई देशों में बड़ी कड़ी पाबंदी है. मैं अपने जिन साथियों की सिगरेट छुड़ाना चाहता था, वे तो मानो अपने ननिहाल में पहुंच गए थे.

तीर्थयात्रा, शाकाहार और बिल्लियां

सीरिया के दमिश्क (डमैस्कस) में तो हमारे कई साथी एक बड़ी धार्मिक अहमियत वाली मजार पर गए जहां कोई सौ-पचास एकड़ पर हजारों लोग एक वक्त पर थे.

वहां हमारे एक ईरानी-पाकिस्तानी साथी पहले तो कहते रहे कि किस तरह उन्हें ऐसे तीर्थ पर चार-पांच घंटे भी कम लगते हैं, और फिर घंटे भर रूकने वाली जगह पर वे खासा वक्त एक हुक्का बार में मजा लेते बैठे रहे.

इस गुडग़ड़ाने की तस्वीरें लेकर जब बिराज (पटनायक) दिखाने लगे तो हम सब तीर्थयात्रा के इस अंदाज पर हक्का-बक्का रह गए.

वहीं पर जब हमारी एक साथी उज्मा का बटुआ चोरी हो गया और रिपोर्ट लिखाने हम मजार पुलिस थाने गए तो वहां के आला अफसर ने गज़ा यात्री होने की वजह से पूरी अहमियत दी और सिगरेटों के धुएं से भरे कमरे में वह स्कूल के बचपन में, लेकिन कोर्स से परे पढ़ी रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता याद करके सुनाने लगा.

टैगोर के अलावा स्कूली दिनों में ही उसने मारकेज़ सरीखे कई लोगों को पढ़ लिया था जिन्हें बाद में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था.

दमिश्क का थानेदार और बचपन में पढ़े टैगोर की कविता अब तक याद!! मुझे शर्म लगी कि यह कविता तो मैंने कभी पढ़ी तक नहीं थी (बाकी लगभग तमाम कविताओं की तरह).

तुर्की और सीरिया के बाजारों में एक तरफ तो दूकानें हिजाब से सिर ढंकी कठपुतलियों से सजी थीं तो ठीक वहीं पर महिलाओं के भीतरी कपड़े बड़े उत्तेजक अंदाज में सजे हुए थे.

सार्वजनिक जगहों पर ढंकी रहने वाली मुस्लिम महिलाओं की निजी जिंदगी में फैशन की बहार थी और बाज़ारों में ऐसे कपड़े परख कर लेती महिलाओं की तस्वीरें लेने का हौसला आखिर तक नहीं जुट पाया.

सीरिया के दमिश्क शहर के बीच बसा एक ऐसा पुराना बाजार था जिसकी फर्श तक जगह-जगह धंस गई थी और जिसे लोग 5-6 सौ बरस पुराना बताते थे.

वह लगता भी वैसा ही था और अब वह पर्यटक बाजार बन चुका था.

दमिश्क के ही एक दूसरे बहुत बड़े बाजार में हम शुक्रवार को जा पाए इसलिए वह लगभग बंद मिला लेकिन वहां के एक कालीन दूकानदार ने बताया कि वह दुनिया के सबसे पुराने और आज तक के जिंदा बाजारों में से एक है और एक वक्त वह घोड़ों की खरीद बिक्री के लिए बना था.

इसी बाजार में मध्यपूर्व के देशों में सबसे पुरानी होने का दावा करती आईसक्रीम दुकान मिली जिसकी दीवारों पर वहां के पुराने तमाम शासकों की तस्वीरें लगी थीं, उस वक्त की जब वे वहां आईसक्रीम खाने आए थे.

वहां कूट-कूट कर आईसक्रीम बनाने की एक नई ही तकनीक दिखी और घन से चलाते नौजवान कर्मचारियों की मजबूत मांसपेशियों पर हमारे काफिले की कुछ युवतियां फिदा होकर लौटीं, तो महज लैपटॉप पर कसरत करने वाले आदमियों के चेहरे उतर गए.

किसी भी देश में एक भी कुत्ता नहीं था क्योंकि इस्लाम में उसे एक गंदा जानवर माना जाता है इसलिए बिल्लियों की मौज थी.

वे गली-गली, घर-दूकान हर कहीं राजसी अंदाज में बिखरी दिखती थीं. एक तो बिल्ली का मिजाज ही सिर चढ़ा होता है, फिर कुत्तों की फिक्र न हो तो वह सड़क किनारे की दुकानों पर, कालीनों पर धूप सेंकते पसरी रहती थीं और भारी-भरकम कैमरों के शटर की आवाज से भी उनकी आंखें नहीं खुलती थीं.

ईरान, तुर्की, सीरिया के तौर तरीके एक दूसरे से अलग थे. बड़े कड़े नियमों वाले ईरान से बिल्कुल अलग सीरिया.

दुकानों में महिलाओं के फैशन की एक झलकी

वहां सड़क किनारे नाच-गाने के ऐसे इश्तहार लगे थे, मानो पश्चिम के किसी देश में आ गए हों. याद रखना हो तो सुरा-सुंदरी और सीरिया, ये सब स से शुरू होते हैं.

मिस्र से वीजा मिलने की राह तकते तो हम चार-पांच दिन दमिश्क रहे और चार-पांच दिन लताकिया. सीरिया के ये दोनों शहर ऐसे महफूज थे कि कारवां के लड़के-लड़कियां रात भर सड़कों पर घूमकर आ जाते थे, बिना किसी दिक्कत.

लेकिन खुफिया एजेंसियों के कर्मचारी और खुले, छिपे सुरक्षा कर्मचारी तमाम जगहों पर मौजूद थे.

रात तीन बजे भी हम उन्हें सड़कों के किनारे कहीं-कहीं देख और पहचान लेते थे.

सभी पर यह तनाव था कि कारवां पर हमला हो सकता है.

तुर्की में तो हमें किसी अनजान का दिया खाने से भी सख्त मनाही कर दी गई थी और ईरान में भी हमें लगता रहा कि हर वक्त, हर जगह कुछ फोटोग्राफर हम लोगों के चेहरों की ही तस्वीरें ले रहे थे जो कि साधारण बात नहीं लग रही थी.

मिस्र पहुंचने के पहले के करीब दस दिन दमिश्क और लताकिया में राजनीतिक चर्चाओं, फ़लस्तीनियों की राहत कॉलोनियों में आने-जाने के साथ-साथ कुछ समय आराम और कुछ पर्यटन में भी गुज़रे.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+