महंगाई, वित्तीय घाटा 2011 में भी बनी रहेगी चुनौती

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा कराए गए एक अध्ययन में कहा गया कि सरकार को वित्तीय घाटा को भी तय सीमा में सीमित करने में काफी समस्या आएगी, क्योंकि कल्याणकारी कार्यक्रमों पर अधिक खर्च और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के चलते वित्तीय दबाव बना रहेगा।

फिक्की द्वारा आर्थिक स्थिति का जायजा लेने के लिए कराए गए इस सर्वेक्षण में कहा गया कि आर्थिक स्थिति नियंत्रण में है फिर भी वित्तीय घाटा को तय सीमा में सीमित करना 2011-12 और 2012-13 में एक चुनौती बनी रहेगी।

मौजूदा कारोबारी साल में 3जी स्पेक्ट्रम और ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस की नीलामी से हासिल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी के कारण वित्तीय घाटा इस साल जीडीपी के 5.5 फीसदी से कम रहने की सम्भावना है।

विनिवेश से अर्जित राशि, बेहतर कर संग्रह और पेट्रोल को नियंत्रण मुक्त करने से सब्सिडी पर बोझ कम होने से मौजूदा कारोबारी साल में वित्तीय घाटा को जीडीपी के 5.3 फीसदी स्तर पर बनाए रखने में मदद मिलेगी।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि हालांकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने और प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के कारण खर्च काफी अधिक बढ़ने के कारण अगले दो सालों तक सरकार को कुशलता के साथ वित्तीय प्रबंधन करना होगा।

सर्वेक्षण में कहा गया कि 2011 में महंगाई चिंता का सबब बनी रहेगी। यह सर्वेक्षण 11 अर्थशास्त्रियों के बीच 29 दिसम्बर से 18 जनवरी के बीच किया गया था।

फिक्की ने एक बयान में कहा कि खाद्य महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए पूरी तरह कृषि उत्पादन बढ़ाने और कृषि उत्पादकता का स्तर बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

सर्वेक्षण के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था 2010-11 में 8.7 फीसदी की दर से विकास करेगी। थोक मूल्य पर आधारित महंगाई की दर मौजूदा कारोबारी साल के अंत तक सात फीसदी स्तर पर बनी रहेगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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