बेटियां कहती हैं, 'हमें उड़ने से मत रेाको'

भेापाल, 24 जनवरी (आईएएनएस)। "जब हम छोटे थे, तब कोई बाहर जाने से नहीं रोकता था और न ही डांटता था, मगर अब ऐसा नहीं है। हम जब थोड़ी देर से लौटती हैं तो अलग-अलग सवाल पूछे जाते हैं। जैसे- कहां जा रहे हो, किसके साथ जा रही हो, किसके साथ खेल रही थी और कब आओगी। लेकिन लड़कों के साथ ऐसा नहीं होता है।"

यह दर्द है उन बालिकाओं का, जो उन्होंने अपने पोस्टरों के जरिए जाहिर किया है। मौका था बालिका दिवस पर आयोजित पोस्टर प्रदर्शनी का।

मध्य प्रदेश की चाइल्ड राइट ऑब्जर्वेटरी ने सोमवार को विभिन्न स्कूली बालिकाओं के पोस्टरों का प्रदर्शन किया। इन पोस्टरों में बालिकाओं ने अपने विचार और लड़के व लड़कियों की स्थिति को जाहिर किया। ये पोस्टर समाज में लड़के और लड़कियों के बीच बरते जाने वाले भेदभाव का खुलासा करते हैं। इतना ही नहीं, ये पोस्टर बताते हैं कि उन्हें लड़कों के मुकाबले सुविधाएं नहीं मिलतीं और उन्हें अपनी इच्छा के अनुरूप खेलने-कूदने और पढ़ने तक से रोका जाता है।

भदभदा के नवीन हाईस्कूल की छात्रा तमन्ना जहां कहती हैं, "समाज में भले ही लड़के-लड़कियों में भेदभाव न होने की बात की जाती हो, मगर ऐसा है नहीं। संस्कृति और परंपराओं का हवाला देकर बालिकाओं से कहा जाता है कि ऐसा मत करो, ये मत करो। यह सब उनके साथ इसलिए होता है, क्योंकि वे लड़की हैं।"

इसी तरह छठी कक्षा में पढ़ने वाली खुशबू कहती है कि वह डाक्टर बनना चाहती है, मगर परिवार के लोग उसे पेंटर बनाना चाहते हैं। उस पर परिजनों की इच्छा यह इसलिए थोपी जा रही है, क्योंकि वह लड़की है। इतना ही नहीं, वह कहती है कि समाज में वह देखती है कि किसी भी परिवार के लड़के को तो कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया जाता है, जबकि उसी घर की लड़की को सरकारी स्कूल में भेजा जाता है।

अंकुर स्कूल की आठवीं की छात्रा सीमा पांडे यह नहीं मानती हैं कि लड़कियों का अपना भविष्य तय करने का अधिकार है। वह कहती है कि अगर लड़की घर से बाहर निकलती है तो लोग कहते हैं कि वह बिगड़ जाएगी। लड़के और लड़कियों को दुनिया में बराबरी का दर्जा दिए जाने की बात सिर्फ कागजी है। सीमा कहती है, "समाज प्रगतिशील होने का दावा तो करता है, मगर हकीकत में ऐसा नहीं है।"

इस मौके पर मध्य प्रदेश चाइल्ड राइट ऑब्जर्वेटरी की प्रमुख निर्मला बुच, सचिव डा. बम्बल और यूनिसेफ के संचार अधिकारी अनिल गुलाटी ने बालिकाओं से कहा कि वे अपने भीतर हीनता का भाव न पनपने दें। अपनी पहचान बनाने के लिए वे आगे आएं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनमें वह क्षमता है जो लड़कों या पुरुषों में नहीं है। लड़कियां किसी से कम नहीं हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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