शास्त्रीय संगीत और कारों के शौकीन थे भीमसेन जोशी

कर्नाटक के धारवाड़ में जन्में जोशी का निधन सोमवार सुबह पुणे के एक अस्पताल में हो गया। उनके निधन के साथ ही शास्त्रीय संगीत का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया है। जोशी को शास्त्रीय संगीत के अलावा कारों से बहुत प्यार था। उन्होंने केवल 11 वर्ष की उम्र में ही गायिकी शुरू कर दी थी।

जोशी ने 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गाने से देशवासियों के दिलों में अपनी खास जगह बना ली थी। वह किराना घराने से जुड़े थे और उन्हें बेहतरीन 'खय्याल' गायिकी और भजन के लिए जाना जाता था।

जोशी को वर्ष 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।

उत्तरी कर्नाटक के गडग कस्बे में कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में जन्में जोशी की मां का निधन जल्दी ही हो गया था। उन्होंने देश के दिग्गज शास्त्रीय संगीतकार सवाई गंधर्व के यहां संगीत की तालीम लेना शुरू किया, जो किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से शास्त्रीय संगीत की तालीम ले चुके थे।

संगीत की धुन के पक्के जोशी को बचपन से ही एक अदद गुरु की तालाश थी। जोशी अब्दुल करीम खान की राग झिंझोटी 'ठुमरी' सुना करते थे। ठुमरी संगीत ने उन्हें इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने संगीत सीखने का फैसला किया। वर्ष 1933 में वह केवल 11 वर्ष की अवस्था में ही गुरु की तलाश में घर परिवार छोड़कर बीजापुर चले गए।

ऐसा कहा जाता है कि वह बीजापुर एक रेलगाड़ी से गए जिसका किराया उनके एक सह यात्री ने चुकाया था। वह धारवाड़ से पुणे गए और बाद में उन्होंने ग्वालियर जाकर माधव स्कूल में दाखिला ले लिया।

शुरुआती दिनों में जोशी की मदद हाफिज अली खान ने की थी। ग्वालियर में थोड़ा समय बिताने के बाद गुरु की खोज के लिए तीन वर्षो तक उन्होंने उत्तर भारत के कई शहरों का भ्रमण किया। इस दौरान वह नई दिल्ली, कोलकाता, ग्वालियर, लखनऊ और रामपुर गए।

इस दौरान जोशी के पिता ने उन्हें जालंधर में खोज लिया और उन्हें घर लेकर गए। जोशी ने धारवाड़ में ही रहने का फैसला किया और प्रसिद्ध गायिका गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर और बसवाराज राजगुरु के साथ गायिकी के गुर सीखे।

तीन वर्षो के प्रशिक्षण के बाद जोशी 1943 में मुम्बई चले गए और 22 वर्ष की अवस्था में एचएमवी के साथ अपनी गायिकी की शुरुआत की।

लगातार कई वर्षो तक कठिन संगीत साधना के बाद भीमसेन जोशी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया। वह रात कोलकाता में गुजारते थे, तो उनकी अगली शाम दिल्ली में बीतती थी। इसके बाद वह तुरंत मुम्बई के लिए रवाना हो जाते थे वहां कार्यक्रम देने के बाद वह जालंधर चले जाते थे।

व्यस्त कार्यक्रम के चलते जोशी इंडियन एयरलाइंस के पायलटों और हवाईअड्डे के अधिकारियों के बीच जल्दी ही 'फ्लांइग म्यूजीशियन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर हो गए।

जोशी की मुख्य ताकत मराठी, हिन्दी और कन्नड़ में भक्ति संगीत की गायिकी थी। वह 'भजन' और 'अभंग' के लिए काफी मशहूर थे। जोशी ने शास्त्रीय संगीत के अलावा बॉलीवुड की कई फिल्मों में अपनी आवाज दी। जोशी ने 'बसंत बहार' में मन्नाडे के साथ गाना गाया। इसके अलावा 'बिरबल बाई ब्रदर' और 'आंखे' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने गाने गाए।

उल्लेखनीय है कि जोशी की पहली पत्नी सुनंदा कट्टी थीं। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। पत्नी सुनंदा का निधन वर्ष 1992 में हो गया। पत्नी के निधन के बाद उन्होंने वत्सला मुधोलकर से दूसरी शादी की जिनसे उन्हें दो बेटे और एक बेटी है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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