कश्मीर में घटाई जाएगी जवानों की संख्या : पिल्लै (लीड-1)

उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में शांति बहाली के लिए लोगों का विश्वास जीतने के उपायों की योजना के हिस्से के तौर पर पाकिस्तानी कश्मीरियों की यात्रा पर लगे प्रतिबंधों में रियायत दी जा सकती है।

नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय द्वारा 'ह्वाट इज द वे फारवर्ड इन जम्मू एंड कश्मीर' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में पिल्लै ने कहा, "अगले 12 महीनों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर में सुरक्षाबलों की संख्या में 25 फीसदी कटौती की जाएगी, खासतौर से घनी आबादी वाले इलाकों में।"

उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया जाएगा, ताकि अधिक सुरक्षा बलों की मौजूदगी से लोग परेशान न हों।

पिल्लै के अनुसार सरकार जवानों की संख्या में कमी करना चाहती है। राज्य के विभिन्न संगठनों और अलगाववादी राजनीतिक पार्टियों की यही प्रमुख मांग भी है, लेकिन विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसका विरोध कर रही है।

गौरतलब है कि सुरक्षा बलों की संख्या में कटौती का प्रस्ताव तब दिया गया था, जब जून, 2010 से शुरू गर्मियों के 100 दिनों के भीतर तनाव बढ़ गया था और 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसके बाद समस्या के राजनीतिक समाधान का आधिकारिक वादा किया गया था।

केंद्रीय गृह सचिव ने कहा कि अगले कुछ महीनों के भीतर श्रीनगर से कुछ सुरक्षा चौकियों को भी हटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि घनी आबादी वाले इलाकों से सुरक्षाबलों को हटाना उस आठ सूत्री एजेंडे का हिस्सा है, जिसे कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए पिछले साल सरकार ने मंजूरी दी थी।

पिल्लै ने आईएएनएस से कहा, "हम राज्य में सुरक्षाबलों की मौजूदगी जितना संभव हो सके उतना कम करना चाहते हैं।"

पिल्लै ने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन को विवादास्पद सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां कानून (एएफएसपीए) को हटाने के बारे में फैसला करना चाहिए। यह कानून आतंकवाद निरोधक कार्रवाई के दौरान सेना को विशेष अधिकार प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि कश्मीर सरकार क्यों विश्वासपूर्वक यह फैसला नहीं लेती है कि पूरा जम्मू एवं कश्मीर या राज्य का कोई खास हिस्सा अब अस्थिर नहीं है। यह विशेषाधिकार कानून उन जगहों पर लागू होता है, जिसे राज्य सरकार अस्थिर घोषित करती है।

पिल्लै ने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर के पुलिस अधिकारी और सैन्य कमांडर जल्दी ही अस्थिर क्षेत्र कानून (डीएए) पर विचार करने के लिए एक बैठक करेंगे। यह कानून राज्य में आतंकवादी गतिविधि शुरू होने के बाद 1990 में लागू किया गया था।

माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय उन क्षेत्रों में यह विशेषाधिकार समाप्त करना चाहता है, जहां हालत में काफी सुधार हुआ है। उधर, रक्षा मंत्रालय इसलिए इसे लागू रखने के पक्ष में है, क्योंकि उसका मानना है कि आतंकवाद से लड़ने में यह कानून एक रक्षा कवच के रूप में काम करता है।

पिल्लै ने कहा कि केंद्र सरकार वार्ताकारों की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। वार्ताकारों ने लगभग 100 समूहों से बातचीत की है। उन्होंने 60 वर्ष पुराने इस मुद्दे का राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए उन लोगों से भी बात की है, जिनकी बात पिछले कुछ महीनों के दौरान नहीं सुनी गई। अंतिम रिपोर्ट इस वर्ष अप्रैल में आने की संभावना है।

पिल्लै ने कहा कि लगभग 18,00 से 2,500 कश्मीरी युवा जो कि पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं, आत्मसमर्पण के लिए तैयार हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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