गया की पहचान बना 'तिलकुट'
गया (बिहार), 9 जनवरी (आईएएनएस)। मकर संक्रांति आने से पहले बिहार के गया की सड़कों पर सोंधी महक और कई घरों से निकलने वाली धम-धम की आवाज शहर की पहचान बन गई है। गया में हाथ से कूटे जाने वाले तिलकुट बिहार में ही नहीं, बल्कि देश के सभी हिस्सों में प्रसिद्ध है।
गया के इस सांस्कृतिक मिष्ठान की अपनी अलग पहचान है। यहां के तिलकुट न केवल खस्ता होते हैं, बल्कि ये कई दिनों तक खस्ता रहते हैं। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी को तिल की वस्तु दान देना और खाने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता को लेकर धार्मिक शहर गया में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तिलकुट बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ था।
गया के तिलकुट व्यवसायी मदन साह बताते हैं कि गया में रमना मुहल्ले में पहले तिलकुट निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। वैसे, अब टेकारी रोड, कोयरीबारी, स्टेशन रोड सहित कई इलाकों में कारीगर हाथ से कूटकर तिलकुट बनाते हैं। रमना रोड के कारगरों द्वारा बने तिलकुट आज भी बेहद लजीज होते हैं। वे बताते हैं कि कुछ ऐसे परिवार भी हैं जिनका यही खानदानी पेशा बन गया है।
तिलकुट के कारीगर रामचंद्र बताते हैं कि तिलकुट बनाने में मेहनत तो काफी होती है, लेकिन उसके अनुसार मजदूरी नहीं मिलती है। वे कहते हैं कि तिलकुट बनाने का कार्य ठंडे के मौसम में जरूर मिल जाता है, पर शेष दिन अन्य कार्य करने पड़ते हैं। वह कहते हैं कि गया के तिलकुट कारीगर अब राज्य के अन्य शहरों में भी जाने लगे हैं।
एक अन्य तिलकुट व्यवसायी रामेश्वर कुमार कहते हैं कि यहां के तिलकुट झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि अन्य राज्यों में भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि कई क्षेत्रों में गया के तिलकुट के नाम पर अन्य जगहों के कारीगरों के तिलकुट भी बेचे जाते हैं।
गया के तिलकुट की विशेषता पूछने पर वे बताते हैं कि इससे खास्ता कहीं का तिलकुट नहीं हो सकता जो अच्छे तिलकुट की विशेषता है। वह कहते हैं कि कारीगर यहां अलग तरीके से तिलकुट बनाते हैं। उन्होंने कहा कि गया का तिलकुट गया की पहचान बन गई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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