कश्मीरियों की छवि चमकाता जूते चमकाने वाला

श्रीनगर, 8 जनवरी (आईएएनएस)। कभी-कभी एक आदमी की साधारण सी कहानी कई लोगों की जटिल कहानी बयां कर देती है। लोगों के जूते चमकाने वाले शफी शेख ऐसे ही व्यक्ति हैं। वह जम्मू एवं कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में लाल चौक के नजदीक कई दशकों से यह काम कर रहे हैं। शफी के दोस्त उन्हें ठेठ कश्मीरी बताते हैं।

अब 50 साल के हो चुके शफी लाल चौक में तभी से यह काम रहे हैं जब वह केवल 15 वर्ष के थे। इस दौरान कई सरकारें आई और गईं लेकिन इस कश्मीरी की किस्मत नहीं बदली। शफी आज भी बिना किसी शिकायत के पूरी तन्मयता के साथ अपना पूरा दिन अजनबियों के जूते चमकाने में बिता देते हैं।

वर्तमान में प्रदेश में विपक्ष की नेता व 'पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी' (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने बिजली की खराब स्थिति के विरोध में श्रीनगर में लालटेन जुलूस निकाला था।

इस पर शफी कहते हैं, "यदि वह सत्ता में होंती तो आज उमर अब्दुल्ला (मुख्यमंत्री) ऐसा करते। जब से मैंने बचपन से जूते चमकाना शुरू किया है तब से कई सरकारें आई गई हैं।"

वह कहते हैं, "अब मैं बुढ़ापे के नजदीक हूं। कुछ साल बाद शायद मैं जूते चमकाने लायक नहीं रहूंगा। यदि ऐसा होता है तो न तो महबूबा और न ही उमर मेरे व मेरे पविार के लिए भोजन लेकर मेरे घर आएंगे।"

शफी साधारण सी आवश्यकताओं वाले साधारण से व्यक्ति हैं। वह कहते हैं कि वह दिनभर में करीब 100 रुपये कमा लेते हैं जो उनके परिवार के लिए काफी हैं।

जब कश्मीर में बर्फबारी या बारिश होती है तो शफी को अपने घर में ही रहना पड़ता है क्योंकि खराब मौसम में कोई भी अपने जूते चमकवाना नहीं चाहता।

दिलचस्प बात यह है कि शफी कभी भी अपना वोट डालने का अधिकार नहीं छोड़ते हैं। घाटी में जब भी मतदान होता है वह अलगाववादियों के बहिष्कार के बावजूद हमेशा अपने मत का प्रयोग करते हैं।

वह कहते हैं, "मेरे पिता सेना में थे। हमारे परिवार ने हमेशा चुनावों में मतदान किया है। यह एक पारिवारिक परंपरा रही है और मैं इसे जारी रखूंगा।"

शफी कहते हैं कि वह और उनका परिवार परम्परागत रूप से क्षेत्रीय नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) को वोट देते हैं जबकि वह जानते हैं कि सरकार कोई भी बने, उनके जीवन में थोड़ा सा भी सुधार नहीं होगा। वह कहते हैं कि उनके पिता एनसी के संस्थापक शेर-ए-कश्मीर को वोट देते थे और वह व उनका परिवार फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला को वोट देते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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