मैं अपने देश में सुरक्षित नहीं: एलीना सेन

मैं अपने देश में सुरक्षित नहीं: एलीना सेन

नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ता बिनायक सेन की पत्नी एलीना सेन ने कहा है कि उनके लिए 'एक मात्र विकल्प यही बचा है कि वे किसी आज़ाद लोकतांत्रिक देश में जाकर शरण ले लें क्योंकि वे अपने देश में सुरक्षित नहीं हैं.'

छत्तीसगढ़ में लगभग 25 साल से नागरिक अधिकारों और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे डॉक्टर बिनायक सेन को हाल में देशद्रोह के लिए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने बिनायक सेन को माओवादियों के साथ 'सांठगांठ का दोषी' पाया था. डॉक्टर बिनायक सेन को मई 2007 में गिरफ़्तार किया गया था.

महिला अधिकारों की विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एलीना सेन ने दिल्ली के प्रेस क्लब में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान अपने विचार व्यक्त किए है. उनके साथ जाने-माने वकील प्रशांत भूषण भी थे.

बीबीसी संवाददाता शुभोजीत बागची के अनुसार उन्होंने कहा, "मैं अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित हूँ. मेरे पीछे दो बच्चियाँ हैं जिनमें से एक बच्ची अभी पढ़ाई कर रही है...इस पूरे घटनाक्रम के बाद मेरे पास यही विकल्प रह गया है कि मैं किसी आज़ाद लोकतांत्रिक देश के दूतावास में जाकर शरण ले लूं क्योंकि मैं अपने देश में सुरक्षित नहीं हूँ."

उन्होंने कहा की डॉक्टर बिनायक सेन को रिहा कराने की पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के कर्मचारियों ने उन्हें परेशान किया है. उन्होंने ये भी कहा कि उनका पीछा किया जाता है और उनके हर जगह आने-जाने पर नज़र रखी जाती है.

एक सवाल के जवाब में एलीना ने कहा, "यदि राज्य (छत्तीसगढ़) सरकार का बस चला तो मुझे तो जेल से अपने पति का शव ही मिलेगा. जीवित तो वे जेल से बाहर नहीं आएँगे क्योंकि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद ही होता है."

क़ानूनी कार्रवाई के बारे में उनका कहना था, "यदि क़ानूनी कदम उठाना है - वही का़नून, कोर्ट भी उनका, कचहरी भी उनकी....हमें देखना पड़ेगा. मैं वास्तव में निश्चिंत होकर जीवन जीना चाहती हूँ और उसके लिए जो क़दम उठाने पड़े वो मैं उठाऊँगी. एक बात तो है कि हम लंबे समय के लिए फँसा दिया गया है."

बिनायक सेन शुरु से ही राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते. लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की कथित ज़्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.

उनकी गिरफ़्तारी और हाल में आए न्यायिक फ़ैसला का व्यापक विरोध हुआ है.

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