बांग्लादेश में विलुप्त हो रही हैं मछली की दुर्लभ प्रजातियां
यदि यह रुझान बना रहा तो लगभग 70 प्रतिशत स्थानीय मछली की प्रजातियों का अगले कुछ वर्षो में यही हाल होगा।
बांग्लादेश कृषि विश्वविद्यालय में मत्स्य पालन जीव विज्ञान एवं आनुवांशिकी के प्रोफेसर मुस्तफा अली रजा हुसैन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार मछली की 143 स्थानीय प्रजातियों में से लगभग 100 प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।
समाचार पत्र 'द डेली स्टार' ने रविवार को कहा कि हुसैन ने इसके लिए नायलॉन के जाल, इनसेक्टीसाइड्स, रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल और पर्यावासों के समाप्त होने को जिम्मेदार ठहराया है।
रजा हुसैन ने चेतावनी दी है, "यदि संरक्षण के उपाय तत्काल नहीं किए गए तो कुछ प्रजातियां अगले दो वर्षो में लुप्तप्राय हो जाएंगी।"
पहले से लुप्त हो चुकी प्रजातियों में गुतुम, कोरिका, भोल, देबारी, घोरा, मुखिया, नंदिल, कुरसा, भोरखोल, घोरपोइया, एक तरह का टेंगरा और काजुली, टोरेंट कैटफिश, कानी टेंगरा, छोटो कोई और तिला शोल शामिल हैं।
कई वर्षो से लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों में बालीचाटा, बेटांगी, रानी, चेला, दरकिना, पाथोरचाटा, जोइया, घोरा माछ, बैटका और मोहाशोल शामिल हैं।
मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी सैयद आरिफ आजाद ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल के कारण मछलियों के प्रजनन एवं पालन का आधार नष्ट हो गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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