भारत-ईरान के तेल व्यापार पर संकट

भारत में आयात होने वाला 13 प्रतिशत तेल ईरान से आता है.
भारत और ईरान के बीच 12 अरब डॉलर के कच्चे तेल के व्यापार पर सवालिया निशान लग गया है. भारत अपने तेल आयात का 13 फ़ीसदी ईरान से ख़रीदता है.
पिछले हफ़्ते भारतीय रिज़र्व बैंक ने कहा था कि ईरान के साथ तेल के व्यापार पर एशिया क्लियरिंग यूनियन (एसीयू) सिस्टम के बाहर जाकर लेन-देन किया जाए.
एशिया क्लियरिंग यूनियन का मुख्यालय तेहरान में है और वर्ष 1974 में स्थापित ये वो प्रणाली है जिसके तहत सदस्य देश आयात-निर्यात के लिए आसान शर्तों पर कारोबार कर सकते हैं.
ईरान ने नई व्यवस्था के तहत तेल बेचने से मना कर दिया है.
शुक्रवार को भारत और ईरान इस मसले को सुलझाने की कोशिश करेंगे और दोनों देशों के केंद्रीय बैंकों के प्रतिनिधी इस सिलसिले में मुलाक़ात करेंगे.
अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय ने बुधवार को भारतीय रिज़र्व बैंक के क़दम की सराहना की थी.
अमरीका चाहते है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के कारण अन्य देश ईरान के साथ लेन-देन न रखें.
उधर कच्चे तेल की कीमतें पिछले दो साल में शिखर पर हैं और यदि भारत को ईरान से तेल नहीं मिलता तो अपने 13 प्रतिशत निर्यात को पूरा करने के लिए उसे अन्य विकल्पों को खोजना होगा.
गुरुवार को भारत के तेल सचिव एस सुदर्शन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "हम एक वैकल्पिक प्रणाली पर काम कर रहे हैं. इस विषय पर वित्त मंत्रालय के साथ विस्तृत चर्चा हो रही है और अगले कुछ ही दिनों में इस मसले को सुलझा लिया जाएगा..एशियन क्लियरिंग यूनियन प्रणाली में कुछ तनाव है और आरबीआई कुछ बदलाव करना चाहती है."
उधर भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर केसी चक्रबर्ती ने बंगलौर में पत्रकारों को बताया, "ईरान एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है. हमें इसका हल खोजना है. कृप्या समझने की कोशिश कीजिए ये भारत की समस्या नहीं है, ये ईरान की समस्या नहीं है."
कई जानकारों का सुझाव है कि ईरान के साथ जिस तरह से दक्षिण कोरिया अपनी मुद्रा वन में लेन-देन करता है उसी तरह भारत भी किसी भी मुद्रा में लेन-देन कर सकता है.
तेल सचिव सुदर्शन का कहना है, "ये मुद्रा कोई भी हो सकती है. ये (जापान की मुद्रा) येन हो सकती है या फिर ईरान की मुद्रा हो सकती है."


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