नेपाल नरसंहार में भारत की भूमिका की ओर इशारा

काठमांडू, 29 दिसम्बर (आईएएनएस)। नेपाल के शाही महल में तैनात रहे सेना के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने अपने संस्मरणों की किताब में एक नया राग अलापा है। जबकि 2001 में राजा बीरेंद्र और नौ अन्य की हत्या के लिए इस अधिकारी की काफी आलोचना हुई थी।

राजा के शिविर सहायक के पद से चल कर नारायणहिति शाही महल में सैन्य सचिव के पद पर पहुंचने वाले जनरल बिबेक शाह ने अपनी पुस्तक 'मैले देखेको दरबार' (मैंने दरबार को जैसा देखा) में मुसीबत का नया पिटारा खोल दिया है।

शाह ने कहा है कि 599 पृष्ठों वाली यह पुस्तक उनकी डायरी और उनके विचारों पर आधारित है। खासतौर से उन चार वर्षो की डायरी और विचारों के आधार पर, जिस दौरान उन्होंने सैन्य सचिव के रूप में पहले राजा बीरेंद्र और उसके बाद उनके उत्तराधिकारी राजा ज्ञानेंद्र के साथ काम किया था।

शाह का कहना है कि राजा बीरेंद्र यद्यपि एक संवैधानिक राजा थे, लेकिन सेना का आधुनिकीकरण चाहते थे और अत्याधुनिक हथियार खरीदना चाहते थे। राजा बीरेंद्र ने जी36 एसॉल्ट राइफल्स खरीदने के लिए जर्मनी की हथियार उत्पादक कम्पनी, हेकलर और कोच के साथ समझौता भी किया था।

नेपाल में हथियारों को एसेम्बल करने और उन्हें दक्षिण एशिया में बेचने की भी योजना थी।

लेकिन शाह ने कहा है कि यह योजना भारत के लिए अभिशाप थी, क्योंकि बड़े पड़ोसी के रूप में भारत नहीं चाहता था कि नेपाल के पास बेहतर हथियार हों और इसलिए वह दबाव बना रहा था कि नेपाल घरेलू स्तर पर निर्मित भारत के इनसास समूह के हथियार खरीदे, जो कि गुणवत्ता में ठीक नहीं थे।

शाह का कहना है, "मैं समझता हूं कि महल में हुए नरसंहार के पीछे हथियारों की राजनीति एक बड़ा कारण हो सकता है।"

शाह ने लिखा है कि नरसंहार का दूसरा कारण तराई के निवासियों को नेपाली नागरिकता प्रदान करना हो सकता है। तराई के तमाम निवासी भारतीय मूल के थे।

संसद, तराई के निवासियों को नागरिकता प्रदान करने को तैयार थी और विधेयक को मंजूरी के लिए राजा के पास भेज दिया गया था। लेकिन राजा बीरेंद्र ने विधेयक को मंजूरी देने के बदले उस पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय भेज दिया था और सर्वोच्च न्यायालय ने उसे दबा दिया था।

शाह ने लिखा है, "यदि राजा बीरेंद्र ने उस विधेयक को मंजूरी दे दी होती तो कुछ ही वर्षो के भीतर नेपाली नागरिक नेपाल में अल्पसंख्यक बन गए होते। विधेयक रद्द कर दिए जाने के बाद भारत सरकार के कुछ अधिकारियों ने राजा से चिंता जाहिर की थी।"

शाह का कहना है कि राजा ने ऑपरेशन ईगल से सम्बंधित एक अति गोपनीय फाइल उन्हें दी थी। इस ऑपरेशन के जरिए नेपाल में बढ़ रहे माओवाद से निपटने की योजना थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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