गालिब को भूलना, इतिहास भूलने जैसा : वर्मा
मधुश्री चटर्जी
नई दिल्ली, 25 दिसम्बर (आईएएनएस)। राजनयिक व लेखक पवन के. वर्मा कहते हैं कि अन्य स्थानों की तरह दिल्ली में भी महान शायर मिर्जा गालिब को लगभग भूला दिया गया है। वह कहते हैं कि गालिब को भूलना, इतिहास को भुलाने जैसा है।
'गालिब: द मैन, द टाइम्स' के लेखक वर्मा कहते हैं कि दिल्ली बिना किसी गौरव के महान राजधानी नहीं बन सकती।
उन्होंने कहा कि गालिब दिल्ली की महान संस्कृति के रूपक हैं। वर्मा ने सोमवार को गालिब के 213वें जन्मदिन पर एक तीन दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा, "मिर्जा गालिब जैसी साहित्य की पहचान रही हस्ती इतनी उपेक्षित क्यों है। यहां इतिहास को भूलने की बीमारी क्यों है। गालिब की 1869 में मृत्यु के 100 साल बाद तक किसी ने उनके बारे में चिंता नहीं की। उनकी यादें और उनकी विरासत महत्वपूर्ण हैं।"
दिल्ली में गालिब की यादों और विरासत को तरोताजा रखने के नागरिक आंदोलन से जुड़े वर्मा कहते हैं, "साल 1984 में मैं राजधानी की किताबों की एक प्रमुख दुकान पर गालिब पर कोई किताब लेने के लिए गया क्योंकि मैं उनके बारे में जानना चाहता था। मुझे कोई किताब नहीं मिली। अन्य दुकानों पर भी ढूंढ़ने के बाद केवल कुछ ऐसी किताबें मिलीं जिनमें उनके उर्दू के 'दीवान' का अंग्रेजी अनुवाद था। मैंने उर्दू सीखी, पुराने दस्तावेज देखे और गालिब पर एक किताब लिखने का निर्णय लिया।"
वर्मा कहते हैं कि उन्हें इस किताब को लिखने में पांच साल लगे। उन्होंने कहा, "आप सेंट कोलम्बस, सेंट जेवियर और सेंट स्टीफन जा सकते हैं लेकिन यदि आप संस्कृत या उर्दू नहीं सीखते तो आप सांस्कृतिक रूप से अनाथ रहेंगे।"
मिर्जा मोहम्मद असदुल्लाह खान गालिब का जन्म 1797 में आगरा में एक तुर्की परिवार में हुआ था। उन्होंने नौ वर्ष की उम्र से ही शायरी शुरू कर दी थी।
अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय ने उन्हें दो खिताबों 'दाबीर-उल-मुल्क' और 'नज्म उद-दौलाह' से नवाजा था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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