सेन को देशद्रोह के लिए आजीवन कारावास (राउंडअप)

रायपुर, 24 दिसम्बर (आईएएनएस)। नागरिक अधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को नक्सलियों से कथित सम्बंधों के कारण शुक्रवार को देशद्रोह का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने सेन के साथ-साथ नक्सली समर्थक नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को भी दोषी ठहराया और उन्हें भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

अदालत के इस फैसले से निराश सेन के परिवार ने शुक्रवार को भारतीय लोकतंत्र का दुखद दिन करार दिया जबकि उनके साथी कार्यकर्ताओं ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने का संकल्प लिया। सेन को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत सजा सुनाई गई।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश बी.पी.वर्मा ने सेन के अलावा नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को भी दोषी ठहराया और उन्हें भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सान्याल और गुहा पर नक्सली होने का आरोप है।

न्यायाधीश वर्मा ने सेन (59) को भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए और 120 बी के तहत राजद्रोह व साजिश रचने का दोषी पाया।

सेन को छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम व छत्तीसगढ़ गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत भी दोषी पाया गया है। दोषी करार देने के बाद सेन को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया।

उम्र के 80वें दशक में चल रहे नक्सली विचारक सान्याल और कोलकाता के व्यापारी पीयूष (30) पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं और दोनों अदालत में उपस्थित थे। पीयूष गुहा को नक्सलियों को एकजुट करने में सहायता देने का दोषी पाया गया है।

सेन को मई 2007 में बिलासपुर से गिरफ्तार किया गया था। उन पर नक्सलियों की मदद करने का आरोप है। गिरफ्तारी के बाद सेन दो वर्षो तक जेल में रहे और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मई 2009 में उन्हें जमानत पर छोड़ा गया। सेन को विभिन्न धाराओं में सुनाई गईं सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

सेन को हालांकि राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के मामले में बरी कर दिया गया है।

सेन की पत्नी इलिना सेन ने अदालत परिसर में कहा, "मैं अदालत के फैसले से पूरी तरह असहमत हूं। उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। हम इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय जाएंगे।"

इलिना ने कहा, "जिस व्यक्ति ने 30 वर्षो तक देश के गरीबों के लिए काम किया हो, यदि वह व्यक्ति राजद्रोह और साजिश रचने का दोषी पाया जाता हो, और वहीं पर अपराधी और घोटालेबाज स्वच्छंद घूम रहे हों, तो मैं समझती हूं यह एक शर्मनाक स्थिति है।"

इलिना ने कहा, "मुझे दुख है। मैं इसलिए दुखी हूं, क्योंकि मेरी बेटियों, मेरे पति और मुझे एक और लम्बी लड़ाई लड़नी होगी। मुझे नहीं पता कि यह लड़ाई कितनी लम्बी होगी। मुझे भारतीय लोकतंत्र की स्थिति को लेकर और भी ज्यादा दुख है।"

सेन के भाई दीपांकर सेन ने रूंधे गले से अदालत परिसर में मीडियाकर्मियों से कहा, "मैं बेजुबान हो गया हूं, कृपया मुझे अकेला छोड़ दीजिए।"

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राष्ट्रीय महासचिव कविता श्रीवास्तव ने नाराजगी के साथ कहा, "यह मामला छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस ने गढ़ा है। हम इसके खिलाफ अपील करेंगे।" सेन पीयूसीएल के उपाध्यक्ष हैं।

पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र के.सेल ने कहा, "यह अन्याय है, पूरी तरह निराशाजनक। सेन के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। हम इसके खिलाफ अपील करेंगे।"

पीयूसीएल के सचिव महिपाल सिंह ने नई दिल्ली में आईएएनएस से कहा, "मैं हैरान हूं। हमें इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी, क्योंकि उनके खिलाफ सबूत का एक कतरा भी नहीं था। हमारे लोकतंत्र के लिए यह एक बुरा दिन है।"

सिंह ने कहा, "हमें अभी-अभी फैसले की प्रति मिली है, इसलिए आगे की कानूनी प्रक्रिया तय करने में हमें थोड़ा समय लगेगा।"

वहीं, सेन की इस सजा पर नेपाल में माओवादी सांसद ने इसे 'धोखाधड़ी का मामला' बताया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी और नेपाल के माओवादी सांसद हरि रोका ने काठमांडू में कहा, "बिनायक सेन मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और उन पर इस तरह का दोष नहीं मढ़ना चाहिए। यह गलत और निंदनीय है। भारतीय अधिकारियों को न्यायालय के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए।"

उल्लेखनीय है कि मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के पदाधिकारी रहे सेन ने यहां काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी। नाकामियों और असफलताओं को लेकर उन्होंने सरकार से सवाल किए। उन्होंने राज्य में चल रहे सलवा जुड़ुम के औचित्य पर भी सवाल उठाया। चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए उन्हें देश और विदेश में सम्मानित भी किया गया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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