भारत में पहली बार घुटना बदलने के लिए वर्चुअल सर्जरी
गुड़गांव के निजी अस्पताल मेदांता ने बुधवार को 'वर्चुअल टोटल नी रिप्लेशमेंट सर्जरी' पेश की। मेदांता के हड्डी और जोड़ संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक राजगोपाल ने नई प्रौद्योगिकी को पेश करते हुए कहा कि यदि व्यक्ति के घुटने की खास विविष्टताओं के आधार पर सही घुटना लगाया जाए, तो यह कम-से-कम 20 साल तक चल जाता है। यदि इसकी ठीक हिफाजत की जाए, तो यह 35 साल भी चल सकता है।
इस प्रौद्योगिकी में शल्य क्रिया से पहले कम्प्यूटर पर अधिक-से-अधिक काम पूरा कर लिया जाता है, इसलिए इसे वे इसे वर्चुअल सर्जरी कहते हैं। अधिक-से-अधिक काम पहले पूरा हो जाने के कारण शल्य क्रिया में कम समय और कम उपकरणों का उपयोग होता है। रोगी को तकलीफ भी कम होती है, खर्च कम होता है और मरीज जल्दी सामान्य स्थिति में आ जाते हैं।
घुटने बदलने की इस नई प्रौद्योगिकी में पारंपरिक पद्धति के तीन से साढ़े तीन लाख रुपये के खर्च के मुकाबले लगभग 35,000 रुपये अतिरिक्त खर्च होते हैं। दूसरे मद में हालांकि रोगी का खर्च बच जाता है। पारंपरिक पद्धति में जहां रोगी को कम-से-कम दस दिन अस्पताल में रहना पड़ता है, वहीं इस प्रौद्योगिकी में रोगी को एक सप्ताह ही अस्पताल में रहना पड़ता है। इस प्रोद्योगिकी से लगे घुटने अधिक समय तक चलते हैं, इसलिए घुटने को दोबारा बदलने पर होने वाला खर्च भी मरीज को बच जाता है।
राजगोपाल ने बताया कि उन्होंने इस पद्धति से यहां अब तक छह घुटने बदले हैं। इस पद्धति से उन्होंने सबसे पहला घुटना यहां 17 दिसंबर, 2010 को बदला। उन्होंने बताया कि वे अब तक पारंपरिक और नई दोनों ही पद्धतियों से कुल लगभग 14,000 घुटने बदल चुके हैं।
इस मौके पर मेदांता के अध्यक्ष और चर्चित शल्य चिकित्सक डॉ. नरेश त्रेहान ने कहा कि मेदांता की स्थापना करने का उनका मकसद है कि दुनिया के सबसे अच्छे चिकित्सकों और सबसे बेहतरीन प्रौद्योगिकी को भारत में कम-से-कम खर्च में उपलब्ध कराया जाए।
राजगोपाल ने पारंपरिक और नई पद्धति के अंतर को सपष्ट करते हुए कहा कि पारंपरिक पद्धति में मरीज को ठीक उसके घुटने की बनावट के अनुरूप घुटना नहीं लगाया जाता है, जबकि दुनिया में शायद ही किसी दो आदमी के घुटने एक जैसे होते हों। यहां तक कि एक व्यक्ति के दोनों घुटने भी एक जैसे नहीं होते हैं। इसके साथ ही हर घुटने के कोण और झुकाव भी एक जैसे नहीं होते हैं।
उन्होंने कहा कि नई प्रौद्योगिकी में वे हर आदमी के घुटने के विशेष कोण के आधार पर वास्तविक ऑपरेशन से पहले कम्प्यूटर की मदद से बिल्कुल सही कोण का घुटना तैयार किया जाता है, उसके बाद ही वास्तविक शल्य क्रिया को अंजाम दिया जाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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