बिहार में इस वर्ष त्वरित सुनवाई में 12,941 लोगों को सजा
पुलिस मुख्यालय में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष नवंबर तक त्वरित सुनवाई में कुल 12,941 लोगों को सजा सुनाई गई जिसमें 37 को फांसी और 1,735 को आजीवन कारावास की सजा दी गई। राज्य के पुलिस महानिदेशक नीलमणि ने आईएएनएस को बताया कि इसमें पटना में सबसे अधिक 1,213 लोगों को सजा मिली जबकि दूसरे स्थान पर बांका जिला रहा, जहां 1,027 लोगों को सजा सुनाई गई। इसके अलावा बेगुसराय में 827 तथा सीवान जिले में 634 लोगों को सजा मिली।
बिहार में वर्ष 2006 से प्रारम्भ किए गए त्वरित सुनवाई अभियान में पहले वर्ष 6,839 लोगों को सजा सुनाई गई थी जबकि 2007 में 9,853 लोगों का सजा मिली। इसी तरह वर्ष 2008 में 12,007 और 2009 में 8,042 लोगों को सजा मिली।
पुलिस का मानना है कि मामलों की त्वरित सुनवाई होने से अपराधियों में खैाफ पैदा हुआ है। राज्य के पुलिस महानिदेशक नीलमणि कहते हैं कि त्वरित सुनवाई होने से अपराधियों को सजा जल्द मिल जाती है, इस कारण अपराधियों में खौफ पैदा हुआ है।
इधर, पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एम़ पी़ गुप्ता कहते हैं कि राज्य में त्वरित सुनवाई प्रारम्भ होने से जहां न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी आई है वहीं अपराधियों को जल्द सजा मिलने से समाज में यह संदेश भी गया है कि अपराधी अब अपराध कर ज्यादा दिनों तक नहीं बच सकते। उन्होंने कहा कि राज्य में त्वरित सुनवाई के तहत वर्ष 2006 से इस वर्ष नवंबर तक 54,786 लोगों को सजा सुनाई गई है।
उन्होंने बताया कि सरकार ने त्वरित सुनवाई के तहत पुराने मामलों को भी जल्द निपटाने की कोशिश की है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1997 में हुए अरवल जिले के बाथे नरसंहार कांड का फैसला इस वर्ष सात अप्रैल को आया जबकि भोजपुर जिले की एक अदालत ने नगरी बाजार में वर्ष 1998 में हुए 10 लोगों की हत्या के मामले में 12 अगस्त 2010 को फैसला सुनाया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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