कांग्रेस महाअधिवेशन:कार्यकर्ताओं की बात कागजों में, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी (विश्लेषण)
नई दिल्ली, 20 दिसम्बर (आईएएनएस)। भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के आरोपों से घिरी और विकिलीक्स के खुलासों से मुसीबतों में फंसी कांग्रेस का बुराड़ी महाधिवेशन जब आरंभ हो रहा था तो ऐसी उम्मीद जताई जा रही थी कि वह इन सवालों पर विपक्ष को उपयुक्त जवाब देगी। पहले दोनों मुद्दों पर बहुत हद तक हुआ भी ऐसा ही, लेकिन विकिलीक्स खुलासे पर सोनिया और राहुल की चुप्पी ने 'राज' को 'राज' ही बने रहने दिया। इसके अलावा कुछ और भी मुद्दे थे जो अनुत्तरित रह गए।
महाधिवेशन के जरिए कांग्रेस ने एक स्पष्ट संदेश यह दिया कि विपक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कितनी ही आलोचना क्यों न करे वह उनके साथ मजबूती से खड़ी है और राहुल को प्रधानमंत्री पद पर बैठाने को लेकर किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं है। महाधिवेशन में एक बात यह भी सामने आई कि तथाकथित 'हिन्दू आतंकवाद' के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों के मुद्दे पर वह चुप नहीं बैठने वाली है, बल्कि वह और आक्रामक होगी। पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह के बारे में वह धारणा भी खत्म हो गई कि वह राजनीतिक हाशिए पर डाल दिए गए हैं। अन्य नेताओं की अपेक्षा वह मजबूत होकर उभरे। उन्हें सोनिया-राहुल का समर्थन भी मिला।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस का वही अड़ियल रवैया दिखा जो संसद सत्र में दिखा था। किसी भी सूरत में वह 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की संयुक्त संसदीय दल (जेपीसी) से जांच कराने को तैयार नहीं है। मतलब साफ है वह इस मुद्दे पर विपक्षी दलों से दो-दो हाथ करने को तैयार है। 'हिन्दू आतंकवाद' के मुद्दे पर उसने भाजपा और संघ परिवार को पहले ही दिन खुली चुनौती दी थी।
राहुल से उम्मीद की जा रही थी कि वह विकिलीक्स खुलासे पर अपनी राय रखेंगे लेकिन उन्होंने खुद को विवादों से दूर रखना ही बेहतर समझा। ज्ञात हो कि विकिलीक्स ने हाल में यह खुलासा किया था कि राहुल के मुताबिक हिन्दू आतंकवाद भारत के लिए इस्लामी आतंकवाद के मुकाबले बड़ा खतरा है।
सोनिया से उम्मीद थी कि वह भी विकिलीक्स के उस खुलासे का जवाब देंगी जिसमें कहा गया था कि सोनिया में सैद्धांतिक नेतृत्व का अभाव है। अपने सम्बोधन के जरिए उन्होंने कुछ हद तक इसे चुनौती देने का प्रयास किया।
बुराड़ी में मंगलवार को 'तम्बुओं' में बसाए गए 'राजीव नगर' में कांग्रेस का 83वां पूर्ण अधिवेशन महज औपचारिकताओं तक ही सीमित रहकर समाप्त हो गया। वह चाहे बिहार चुनाव की हार हो या कार्यकर्ताओं की पीड़ा, नेताओं की राजनीतिक पैंतरेबाजियों के बीच आम कार्यकर्ताओं की आवाज सुनाई नहीं दी। भावी विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति पर कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाया। गठबंधनों की भावी रूपरेखा पर भी पार्टी खामोश रही जबकि आने वाले दिनों में जिन राज्यों में चुनाव हैं उनमें तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं जहां क्रमश: द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और तृणमूल कांग्रेस केंद्र में उसकी सहयोगी हैं। दोनों के साथ उसके रिश्तों में हाल में तल्खी आई है।
महाधिवेशन में संगठन पर जोर और कार्यकर्ताओं को महत्व दिए जाने की बात कही गई लेकिन साथ ही उन्हें यह भी जता दिया गया कि पार्टी से ऊपर कोई नहीं है। कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार ऐसा हुआ कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी(एआईसीसी) सदस्यों को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला। हजारों पर्चियां मंच पर भेजी गई लेकिन बात कागजों पर ही सिमट गई। परेशान और हताश बिहार के कार्यकर्ताओं के लिए अंतत: मीडिया ही सहारा बना।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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