भोपाल गैस पीड़ित भर रहे मौत का 'सहमति पत्र'
भोपाल में दो से तीन दिसम्बर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड कम्पनी से रिसी गैस ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। वहीं इसकी चपेट में आए लाखों लोग आंख, श्वास, गुर्दे, कैंसर जैसी बीमारियों के शिकार हो गए। इनमें सबसे ज्यादा फेफड़ों के मरीज हैं।
भोपाल मेमोरियल अस्पताल में श्वास रोग से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए पल्मोनरी मेडिसिन विभाग बनाया गया। यह विभाग अब इलाज के लिए भर्ती होने वाले मरीजों से एक सहमति पत्र भरवा रहा है।
इस पत्र में साफ लिखा है कि विभाग के पास विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं, लिहाजा उनका इलाज दवा विशेषज्ञों द्वारा किया जा रहा है। यह दीगर बात है कि दोपहर दो बजे के बाद दवा विशेषज्ञ इलाज के लिए उपलब्ध नहीं होते।
विभाग की ओर से जारी सहमति पत्र में कहा गया है कि इलाज के दौरान जटिल समस्याएं उत्पन्न होने से मरीज की मौत तक हो सकती है। ऐसे में मौत का जिम्मेदार मरीज स्वयं होगा। सहमति पत्र भराए जाने से अस्पताल व गैस पीड़ितों में हड़कंप मचा हुआ है।
पल्मोनरी वार्ड एक के बिस्तर नम्बर 30 पर भर्ती मरीज रामनारायण ने आईएएनएस को बताया कि उनके साथ कई अन्य मरीजों को सहमति पत्र भरने के लिए दिए गए हैं।
उधर, चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि सहमति पत्र अमूमन सरकारी या निजी अस्पतालों में उन मरीजों अथवा उनके परिजनों से भरवाए जाते हैं, जिनका ऑपरेशन होना होता है। भर्ती होने वाले मरीजों से सहमति पत्र भरवाने का शासकीय स्तर पर कोई प्रावधान नहीं है।
भोपाल गैस पीड़ित सहयोग संघर्ष समिति की साधना कार्णिक का कहना है कि एक तरफ मरीजों को इलाज की सुविधा नहीं है, वहीं उनसे 'मौत' के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं।
अस्पताल के पल्मोनरी विभाग के निदेशक डॉ. के.के. मोदार ने आईएएनएस से कहा कि वह दिल्ली में एक बैठक में हिस्सा लेने आए हैं, इसलिए वह इस मसले पर कुछ नहीं कह सकते।
वहीं, प्रदेश के गैस राहत मंत्री बाबू लाल गौर ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए सहमति पत्र भरवाने को जायज ठहराया। उनका कहना है कि चिकित्सकों की कमी हैं, ऐसे में एहतियात बरतना जरूरी है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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