मृतप्राय हो रही है तिब्बती कालीन बुनाई कला

धर्मशाला, 14 दिसम्बर (आईएएनएस)। तिब्बतियों द्वारा हाथ से बुनकर बनाए जाने वाले ऊनी कालीनों पर उकेरे गए ड्रैगन, पक्षी और अन्य मनमोहक चित्र इनके खरीदारों की स्मृतियों में उतर जाते हैं और इन कालीनों को सहेज कर रखने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन अब कालीन निर्माण की यह कला मृतप्राय हो रही है।

हजारों निर्वासित तिब्बतियों के 'छोटे तिब्बत' के रूप में विख्यात धर्मशाला अब अपनी बौद्ध संस्कृति को सहेजने के लिए संघर्ष कर रहा है। संस्कृति की विरासत समझी जाने वाले इन कालीनों की बुनाई की कला भी अब संकट में आ गई है।

युवाओं में इस कला के प्रति रुझान में कमी आने से इसके लिए सिद्धहस्त बुनकरों की भारी कमी हो गई है।

तिब्बती हस्तशिल्प सहकारी समिति के प्रबंध निदेशक पेमा दोरजी ने कहा, "नई पीढ़ी कालीन बुनाई की कला में रुचि नहीं ले रही है। इसके लिए श्रमिकों की बड़ी संख्या में जरूरत होती है। यह चिंता का विषय है।"

उन्होंने कहा कि कालीन बनाने का काम ज्यादातर बुजुर्ग महिलाएं कर रही हैं।

उन्होंने कहा, "इससे पहले देश की सभी 52 तिब्बती बस्तियों में हमारे कालीन बुनाई केंद्र थे। अब केवल शिमला, धर्मशाला, डलहौजी और राजपुर के यह केंद्र बचे हैं।"

तिब्बती ऊनी कालीन हस्तनिर्मित और परंपरागत डिजायनों जैसे ड्रैगन, पहाड़, पक्षी, और प्रकृति के अन्य चित्रों से सुसज्जित होते हैं। इनकी कीमत 5,000 रुपये 30,000 रुपये के बीच होती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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