टाटा की निजता याचिका पर फरवरी में होगी सुनवाई
ज्ञात हो कि टाटा ने राडिया टेप की सामग्री को प्रकाशित करने से रोकने के लिए अदालत में याचिका लगाई थी।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि शिकायत की प्रति और अन्य सम्बंधित दस्तावेजों को मुहर बंद लिफाफे में अदालत को सौंपे।
इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल), चेन्नई प्रेस क्लब और डॉ. जे. के. जैन को हस्तक्षेप करने की अनुमति भी दी। सीपीआईएल ने मांग की है कि नीरा राडिया के टेप में निहायत ही निजी बातों को छोड़कर अन्य सामग्री को सार्वजनिक किया जाए।
उधर, इस टेप के कुछ अंशों को प्रकाशित करने वाली पत्रिका आउटलुक और ओपेन ने कहा कि टाटा एक व्यक्ति के रूप में निजी मूलभूत अधिकारों को लागू करने के लिए संविधान की धारा 32 की आड़ नहीं ले सकते।
रतन टाटा के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि टाटा इस याचिका में मीडिया की आजादी और निजता के अधिकार के बीच संतुलन की बात कर रहे हैं।
साल्वे ने अदालत को विचार करने के लिए आठ सवाल सौंपे।
एक सवाल यह था कि क्या निजता का अधिकार किसी को कानूनी एजेंसी द्वारा दो व्यक्ति विशेष के बीच हुई बातचीत की टेलीफोन टैपिंग को सार्वजनिक होने से रक्षा करता है।
एक अन्य सवाल यह था किसी कानून सम्मत संगठन के टेलीफोन टेप करने के अधिकारों के साथ क्या उसकी गोपनीयता की रक्षा करने की भी जिम्मेदारी लगी होती है।
उधर इन सवालों पर ओपेन पत्रिका के वकील राजीव धवन ने कहा कि टाटा की याचिका वस्तुत: लोक हित याचिका नहीं, बल्कि निजी हित याचिका है।
धवन ने कहा कि यदि टाटा किसी के व्यवहार से आहत हैं, तो वे धारा 32 की सहायता लेने की जगह अवमानना याचिका दाखिल कर सकते थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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