जलवायु सम्मेलन अंतिम दौर में, भारत में रमेश की आलोचना (राउंडअप)
सम्मेलन में भाग लेने वाले 193 देशों को उम्मीद है कि वे 'ग्लोबल क्लाइमेंट फंड' के गठन की घोषणा करने में सक्षम होंगे। इस कोष से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए गरीब देशों को मदद की जाएगी।
'यूएन फ्रेमवर्क कंवेशन ऑन क्लाइमेट चेंज' पर 29 नवंबर से 10 दिसम्बर के दौरान इस कोष के संचालन को लेकर विकसित और विकास देश बंट गए। इसके अलावा यह मुद्दा सम्मेलन के अन्य प्रमुख मुद्दों पर हावी रहा। इस कोष में अभी कोई राशि नहीं है।
सम्मेलन में हालांकि देशों ने इस बात की उम्मीद जताई है कि वे कम से कम एक तंत्र को अंतिम रूप देने में सक्षम होंगे जिससे कि कार्बन उत्सर्जन की प्रौद्योगिकी गरीब देशों को स्थानांतरित की जा सके।
सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के बीच कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर सहमति नहीं बन पाई।
रमेश ने बुधवार को सम्मेलन में कहा था कि सभी देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने के लिए उचित कानूनी प्रावधान के तहत बाध्यकारी संकल्प लेने चाहिए। यह रुख भारत की जलवायु परिवर्तन नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। नए प्रस्ताव से संकेत मिलता है कि भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए बाध्यकारी प्रतिबद्धता स्वीकार करने की ओर बढ़ रहा है।
रमेश पर संसद द्वारा निर्धारित नीतिगत सीमाएं लांघने का आरोप लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और वामदलों ने सरकार से जयराम रमेश के कानकुन में दिए गए बयान पर स्पष्टीकरण देने की मांग की है।
भाजपा प्रवक्ता तरुण विजय ने कहा, "जयराम रमेश ने जो यहां कहा वह अलग था और कानकुन में जो कहा वह अलग है। वह हर बार बयान बदल रहे हैं। इससे देश के हितों को नुकसान होगा और जिस रास्ते को वह अपना रहे हैं वह स्वयं हार मान लेने जैसा है।"
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात ने कहा, "जयराम रमेश के नेतृत्व में कानकुन में मौजूद भारतीय शिष्टमंडल अमेरिका के नेतृत्व वाले विकसित देशों के दबाव में झुक गया है और इसके चलते उसने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कानूनी बाध्यतापूर्ण सीमाएं लागू करने की बात स्वीकार की है। "
पर्यावरणविदों के अनुसार औद्योगीकृत देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वे अपने उत्सर्जन में कटौती करें, क्योंकि वे वर्षो से उत्सर्जन कर रहे हैं। दूसरी ओर विकासशील देशों को विकसित होने का अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) की निदेशक सुनीता नारायण ने कहा, "अमेरिका इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट रहा है कि उत्सर्जन कटौती के लिए उसे जो कुछ करना आवश्यक है, उसे वह नहीं करेगा। लेकिन भारत ने अपने रुख को बिल्कुल बदल दिया है। यह पूरी तरह अस्वीकार्य है और जलवायु परिवर्तन के लिए और भारत के लिए बुरा है। मैं पर्यावरण मंत्री के कानकुन में दिए गए बयान से पूरी तरह भयभीत हूं।"
अमेरिका एकमात्र ऐसा विकसित देश है जिसने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अब तक की एक मात्र वैश्विक संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अमेरिका का स्पष्ट रुख रहा है कि वह किसी भी तरह का कानूनी बाध्यकारी समझौता तब तक नहीं करेगा जब तक कि भारत और चीन ऐसा नहीं करते।
बड़े विकासशील देशों ने अमेरिका के इस रुख का लगातार विरोध किया है जिसके चलते जलवायु परिवर्तन पर वार्ता बाधित रही है। भारत ने पिछले साल कोपेनहेगन सम्मेलन में अपने रुख में परिवर्तन लाते हुए अपने कार्बन उत्सर्जन में 2020 तक 2005 की तुलना में 20-25 प्रतिशत तक कमी करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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